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पास आते पड़ोसी

ईरान के राष्ट्रपति अहमदीनेजाद की इराक-यात्रा अपने आपमें महत्वपूर्ण घटना है और दोनों देशों के बीच संबंधों के सामान्यीकरण के प्रयासों का स्पष्ट संकेत देती है। लंबे समय तक परस्पर घोर शत्रु रहे व भीषण युद्ध लड़ चुके दो पड़ोसियों का नजदीक आना खाड़ी क्षेत्र में नए अध्याय का सूत्रपात कर सकता है, बशर्ते वे ईमानदारी से क्षेत्र की भू-राजनीतिक हकीकतों को पहचानें और सहयोग की राह पर बढ़ें। परमाणु मसले पर ईरान के साथ अमेरिका के तनावपूर्ण संबंधों के बावजूद यह दौरा संभव बना तो इसका एक प्रमुख साझा कारण दोनों देशों में शिया-बहुल सरकारें व आबादी हैं।कुछ अन्य बातों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मित्र देशों- अमेरिका और ब्रिटेन के लाखों सैनिक इराक में अभी भी तैनात हैं, जिसके चलते इस दौरे के पीछे खासकर अमेरिका की मौन स्वीकृति जरूर रही होगी। अहमदीनेजाद का कहना सही है कि छह साल पहले क्षेत्र में आतंकवाद नहीं था और उसने अमेरिकी दखलंदाजी के बाद सिर उठाना शुरू किया। लेकिन, यह हकीकत है कि सद्दाम हुसैन के हाथों उत्पीड़ित शिया नेता ईरान में शरण लेते थे। मित्र देशों की फौज द्वारा सद्दाम सरकार की तख्तापलट के बाद ईरान पर आरोप लगे थे कि वह इराक में उन शिया चरमपंथियों को मदद देकर हिंसा फैला रहा है, जो अमेरिका विरोधी हैं। इस पृष्ठभूमि में इराक की शिया-बहुल सरकार की रणनीति संभवत: यह है कि ईरान से मेलमिलाप कर हिंसा पर अंकुश लगाया जाए। अहमदीनेजाद के दौरे और सहयोग पर अमेरिकी मौन का रहस्य फिलहाल यही नजर आता है। यह दौरा इराक की सुन्नी आबादी के एक हिस्से को रास नहीं आया और उसने उसके खिलाफ प्रदर्शन भी किया। दुनिया के अधिकतर मुस्लिम देशों में सुन्नी बहुल आबादी है, जिनमें अमेरिका-समर्थक सरकारें होने के बावजूद आम आबादी में अमेरिका-विरोधी भावनाएं हैं। इराक में सद्दाम हुसैन के शासनकाल तक सुन्नियों के वर्चस्व वाली अनेक सरकारें रहीं, लेकिन अब यह देखने वाली बात होगी कि उग्रपंथी सुन्नी तत्व शिया-बहुल ईरान के साथ दोस्ती को कितना पचा पाएंगे?

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  • Web Title: पास आते पड़ोसी