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सर्वहारा के देव

मिथिलांचल क्षेत्र में भोर-भिंसार उठकर बुजुर्गो द्वारा प्राती गाने की परंपरा रही है। अपने बिस्तर पर बैठे-बैठे विद्यापति उच्च स्वर में प्राती गाते थे। नई उम्र के लोगों की अर्ध नींद में ही गीत के स्वर कानों में पहुँचते थे। विद्यापति की एक प्राती बहुत लोकप्रिय हुई-‘करवन हरब दु:ख मोर हे भोला नाथ, दु:ख ही जनम भेल, दु:ख ही बीतावल, सुख सपनेहु नहीं भेल, हे भोलानाथ।’ दु:ख में ही जन्म हुआ और दु:ख में ही जिन्दगी कट गई। सुख सपने में भी नहीं आया। कवि भोलानाथ से पूछता है, ‘हमारा दु:ख कब हरोगे?’ गीता में इस संसार को ही दु:खालय कहा गया है। विद्यापति ने भोलेनाथ को स्मरण दिलाया है कि इस संसार में आनेवाला हर व्यक्ित दु:खी है। परंतु दु:ख निवारण करना आपका काम है।ड्ढr ‘पूरी जिलेवी शिव के मनहूँ न भावे, भांग के गोला कहाँ पायब, शिव मानत नाहीं।’शिव को भोजन में भांग का गोला और धतूरा चाहिए। सोने के लिए टुटली मड़ैया चाहिए। चढ़ने के लिए घोड़ा, हाथी नहीं, बसहा बरद (बैल) चाहिए। गरीबों के देव, गरीबी में ही रहते हैं। तभी तो जन-जन के महादेव हैं। विद्यापति ने विवाह गीतों में शिव के दूल्हा रूप का ही वर्णन किया है। जो बसहा बरद पर सवार हैं। भूत-पिशाच, डाकिनी-साकिनी के संग आए हैं। पार्वती की माँ मैना होने वाले जमाई का वह रूप देखकर अचेत हो जाती हैं। मैना का विलाप है, ‘पार्वती के ई वर होयत, अब न रहत मोर प्राण।’ मेरी बेटी का यह वर होगा, तो मैं जीवित नहीं रहूँगी। विद्यापति मैना को नीति समझाते हैं, ‘भनहि विद्यापति सुनु हे मनायन, पार्वती के ई वर लिखल, लिखल मेटलो नहीं जाए।’ विद्यापति ने इस पद के माध्यम से भाग्य की रेखा का महत्व बताया। अर्थात विवाह तो जन्म से पूर्व निश्चित होता है। जनमानस के प्रत्येक दु:ख में धीरज की दवा हैं शिव। उन्हें अपने लिए कुछ नहीं चाहिए। एक धूर जमीन भी नहीं। वे दु:खहरण देव हैं। विद्यापति के लिए शिव जोगी, जटिल और अकाम हैं। जगत के सुखदायक।कार्तिक और गणपति के लिए कुछ नहीं संजोया। वे जन-जन के देव हैं। सर्वहारा के। इसलिए शिव सभी के, सभी शिव के हैं। उस क्षेत्र के जनमानस में शिव की शास्त्रीय छवि को जन छवि में परिवर्तन कर समाज में उतारने में विद्यापति की विशेष भूमिका रही है।ड्ढr शिवरात्रि, शिव विवाह तिथि भी मानी जाती है। शिव और पार्वती का जनम-जनम का साथ माना जाता है। ‘जनम-जनम की रगड़ी हमारी। वरौं शंभु न तो रहौं कुंआरी।’ शिव के ऊटपटांग जीवन की संगिनी बनने के बाद भी यह कामना प्रगट करती है पार्वती। शिव को ही वरण करने के लिए तप करती है। जनमानस में शिव पार्वती का यह वैवाहिक रूप रचा-बसा है, तभी भारतीय दाम्पत्य के आदर्श बनते हैं दोनों। वैवाहिक जीवन को सात जन्मों का साथ माना जाता रहा है। आज छोटी-छोटी बातों पर विवाह के टूट जाने की खबरें आ रही है। महाशिवरात्रि मनाते हुए नई पीढ़ी में शिव पार्वती के वैवाहिक जीवन के आदर्श पिरोने की भी जरूरत है।ड्ढr मृदुला सिन्हां

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