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राजरंग

जी हां, गीत बेचता हूं। मैं तरह- तरह के गीत बेचता हूं। क्या चाहिए- नौकरी, तबादला, क्वार्टर या फिर कुछ सेटिंग करनी है। आपको जो कुछ भी चाहिए, यहां मिलेगा। यह रांची के बड़ी औद्योगिक नगरी का पार्क है। औद्योगिक विकास की बात की जाये और पंडित नेहरू का नाम न आये, यह कैसे संभव है। सो इसका नाम भी बता देते हैं, नेहरू पार्क। पार्क में लोग घूमने -फिरने नहीं आते, बल्कि यहां दुकानें सजती हैं यूनियनों की। हर यूनियन की एक जगह बनी है। वहां दूसरे यूनियन के लोग नहीं बैठ सकते। कामगार आते हैं, कहते हैं, देखिये न नेताजी, उ अफसरवा काम नहीं कर रहा है। नेताजी कहते हैं, देख लेंगे। लेकिन तेरे लिए काहें दौड़ें रे.. रसीदवा दिये थे। चंदा नहीं दिया था। काम पड़ता है, तभी आते हो। पार्क में एक दुकान बड़ी जोर चलती है। यहां ऐसे लोग जमे रहते हैं, जिनकी जमीन - जायदाद कंपनी की स्थापना में चली गयी। इन लोगों के नेताजी भी रहते हैं। बात होती है, इस बार सूची दे दिये हैं। ठेका पर नौकरी हो जायेगी। 25 हजार से कम पर बात नहीं बनेगा। तू- तू, मैं -मैं भी होती है। नेताजी पर आरोप लगता ह,ै फलनवा तो कह रहा था कि उससे दसे हजार में बात हुई है। नेताजी बिगड़ जाते हैं। कहते हैं एक तो नेकी कर फिर दरिया में फेंक।

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