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चिविवि में संचालित हो रही दवा दुकानों में भी खेल

चिविवि की वेलफेयर सोसाइटी द्वारा संचालित हो रही दुवा दुकानों में भी खेल है। दवाआें की खरीद के लिए कोई नियम नहीं है। खरीद कमेटी में कोई वरिष्ठ डॉक्टर शामिल नहीं। चिकित्सा अधीक्षक को भी इसमें शामिल नहीं किया गया। छह चिकित्सकों की एक कमेटी अपनी पसंद की दवाएँ खरीद रही है। उस कमेटी पर एक आर्युेदिक डॉक्टर का नियंत्रण है। करोड़ों की दवाएँ उसी की देखरेख में खरीदी जा रही हैं। वही दवा स्टोर का प्रभारी भी है।ड्ढr सोसाइटी की दुकानों का संचालन 2003 से शुरू हुआ। करोड़ों रुपए की सालाना खरीदारी के लिए अभी तक कोई नियम नहीं बन सका। चिकित्सकों ने पूर्व कुलपति प्रो. हरि गौतम पीजीआई की तर्ज पर एक कमेटी बनाने का प्रस्ताव किया था जिसे खारिज कर दिया गया। उस प्रस्ताव के तहत कमेटी में सभी प्रमुख विभागाध्यक्षों को शामिल करने की बात कही गई थी।ड्ढr एक चिकित्सक का कहना है कि बगैर विभागाध्यक्ष की अनुमति के दवाएँ नहीं खरीदी जानी चाहिए। दवाआें की गुणवत्ता आयुर्वेदिक डॉक्टर कैसे परख सकता है? मरीजों के पास सस्ती दवाआें का विकल्प नहीं है। सोसाइटी की दवा दुकानंे इसलिए खोली गई थीं कि मरीजों एमआरपी से कम पर दवाएँ मिलेंगी। मरीा को इमरजेंसी में बेड के ही पास 24 घंटे दवाएँ उपलब्ध कराने का भी एक मकसद था। पर यहाँ सभी दवाएँ उपलब्ध नहीं रहतीं। परेशान मरीजों बाहर की दुकानों से दवाएँ खरीदने को मजबूर हैं। चिकित्सा अधीक्षक डॉ.एसएन संखवार का कहना है किउन्होंने जल्दी ही कार्यभार संभाला है। दवाआें के खरीद-फरोख्त के सम्बंध में उन्हें जानकारी नहीं है। न तो वे कमेटी के सदस्य हैं।ड्ढr वेलफेयर सोसाइटी के सचिव व दवा खरीद कमेटी के सचिव डॉ. एए मेंहदी का कहना है कि दवाआें की एमआरपी पर मरीजों को 26 प्रतिशत छूट मिल रही है। दवा सीधे कंपनियों से ली जाती हैं। चिविवि की साख पर दवाएँ मिल जाती हैं। बिक्री के बाद कम्पनियों को अदायगी की जाती है। दुकानों से हुए मुनाफे को अस्पताल के कल्याण में खर्च किया जाता है। ट्रामा सेंटर की दुकान से हुए मुनाफे में चार वेंटीलेटर खरीदे गए। लगभग 65 लाख की मशीनों की खरीद प्रस्तावित है। डॉ.मेंहदी के मुताबिक कमेटी की संस्तुति पर ही दवाएँ खरीदी जाती हैं।

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