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गरीबों का आर्केस्ट्रा है ढोल

वनमैन आर्मी का मुझे दूसरा कोई उदाहरण नहीं सूझता सिवाय ढोल के। सारे बैंडबाजे फीके हो जाते हैं जब ढोल बजता है। ढोल ठेठ गांव का गंवई बाजा होकर भी शहर में जाकर शहरियों को भी नचाने की क्षमता रखता है। ढोल ने संगीत के नए चलन को अपना कर यह बता दिया है कि वह किसी से कम नहीं है। ढसोली इस मायने में ए आर रहमान बन गए हैं। वे इतने बड़े कलाकार हैं कि भंगड़े ही नहीं डिस्को को भी बखूबी बजा देते हैं। वह सिर्फ धिन तड़ धिन तड़ नहीं है। गरीब से अमीर की महफिल तक पहुंचता ढोल पूर्णरूप से समाजवादी वाद्य है। गले में सिर्फ पेटी ही लटकती है। वह भी खड़े या चलते में। खुशी से लेकर मातम में यह किसी प्रकार ढल जाता है, यह दांतों तले अंगुली दबाने का अवसर होता है। यह बजट को लतियाता नहीं बल्कि प्रेम से बतियाता है। भगोरिया बैसाखी से ब्याह तक यह ढोल बखूबी निर्वाह करता है। ढोल की पोल ‘फूट’ से ताल्लुक नहीं रखता। फूटने को कोई बलिदान न भी कहे तो यह तुरंत नई लंगोट कस हाजिर होता है। नेता की तरह पेटू होकर भी खाने का दाग नहीं लगवाता है। ढोल पीटने के मुहावरे में दोष और पिटाई दोनों नहीं है। महिलाआें के नृत्य में पुरुष अलाऊ नहीं मगर ढोल न हो तो ढोली से परहेज भी नहीं होता। महिलाएं पुरुषों को अगुलियों पर नचाती है, पर ढोल पराया होकर भी दूसरों की महिलाआें को नचाता है। किसी को एतराज तक नहीं होता। ढोल सालभर बजता रहता है, जन्म दिन सगाई से लेकर होली तक ढोल ‘धनक’ के साथ आ धमकता है। अमावस्या पूनम ग्रहण दिवाली पर भी ‘ढन ढना ढन’ मौजूद रहता है। छोटे बच्चे भी सुनकर दौड़ आते हैं गेट पर। वही थिरकने भी लग जाते हैं। एक तरह से यह लोकवाद्य है। दुनियाभर के आदिवासियों में थोड़ा रूप आकार बदलकर यह विद्यमान है। ढोल लोक कथाआें से जुड़ा है। एक अनाड़ी चोर शातिरों में शामिल हो गया। रात चोरी के लिए गए तो अनाड़ी ने ढोल उठा लिया। छिपने के लिए कपास के खेत में घुसे। उसकी संटी से ढोल बजा। लोग दौड़े तो चोर धन छोड़ भागे। अनाड़ी ढोल छोड़ धन उठा उनके पीछे दौड़ा। चोर समझे यह जासूस है। वह धन राजा को देने जा पहुंचा। राजा उसकी ईमानदारी पर रीझ गया। उसे अपना जासूस नियुक्त कर दिया। चोरों ने उसे देखा तो वे राज्य ही छोड़ चले गए। ढोल के ढेरो किस्से है। फिलहाल तो ढोल की शान में कसीदे काढ़ने का अंत आ गया है।

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