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चिविवि में नर्सिग व्यवस्था लडख़ड़ाईं

चिविवि में नर्सिग लडख़ड़ा रही है। यहाँ नसरे का टोटा है। प्रदेश के 2500 शैय्या वाले इस एकमात्र अस्पताल में मरीजों की देखरेख सिर्फ 225 नसरे के हवाले है। पट्टी तक मरीजों के तीमारदार बाँध रहे हैं। वार्ड ब्यॉय सुनते नहीं। ग्लूकोा बोतल लगाने की जिम्मेदारी स्वीपर निभा रहे हैं। मरीजों का इलाज मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया के कायदे-कानून से नहीं हो रहा। नए खुले विभागों की मान्यता खतरे में पड़ती जा रही है।ड्ढr 10 वषरे से नसरे की भर्ती नहीं हुई। इस दौरान दर्जनों विभाग खुले। पर नसरे की कमी पूरा करने की पहल नहीं हुई। चार वाडरे के मरीजों की देखरेख की जिम्मेदारी एक नर्स के हवाले है। एमसीआई के नियमों के तहत पाँच बिस्तरों पर एक नर्स होनी चाहिए। एक चिकित्सक के अधीन 12 नर्से होनी चाहिए । नतीजतन एक नर्स, तीन शि़फ्ट में डय़ूटी कर रही है। सबसे संवेदनशील टीबी अस्पताल के तीन वाडरे में सिर्फ एक नर्स मरीजों की देखरेख कर रही है। आइसोलेटेड वार्ड का तो बुरा हाल है। वहाँ रात्रि पाली में नसरे को 12 घंटे की डय़ूटी देनी पड़ रही है। इनमें सबसे अहम गांधी वार्ड में भी, रात के समय एक ही नर्स मौजूद रहती है। इमरजेंसी में कई मरीजों के एक साथ आ जाने पर व्यवस्था लडख़ड़ा जाती है। काम के अधिक बोझ से वे बीमार हो रही हैं।ड्ढr नसरे का मानना है कि वे मरीजों के साथ न्याय नहीं कर पा रहीं। मरीजों का ब्लड प्रेशर नापना, समय पर दवा व इंजेक्शन देना, वार्ड में सफाई, बिस्तर का प्रबंध,वार्ड सम्बंधी शिकायत दर्ज कराने व समूचे आर्डर बुक का अनुपालन उन्हीं की जिम्मेदारी है। एक नर्स का कहना है नर्सिग नियमों के तहत मरीजों के साथ न्याय न करना अपराध है। चिविवि की कार्यवाहक सीनियर मैटर्न राम कुमारी गौतम का कहना है कि नसरे पर काम का अधिक दबाव है। सीनियर डॉक्टर से लेकर नीचे के सभी डॉक्टर सिर्फ आदेश करते हैं। वार्ड ब्यॉय नसरे की नहीं सुनते। सीनियर मैटर्न का पद काफी समय से खाली चल रहा है। शिक्षक एसोसिएशन के सचिव डॉ. नईम अहमद का कहना है कि वार्ड में नसरे की जिम्मेदारी कोई दूसरानहीं उठा सकता। चिकित्सा अधीक्षक डॉ.एसएन शंखवार का कहना है कि नसरे की कमी से स्वास्थ्य सुविधाआें पर असर पड़ रहा है। तत्काल 400 नसरे की जरूरत है। वहीं कुलपति प्रो. एसके अग्रवाल का कहना है कि नसरे की माँग की गई है। ंंं

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