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तेल की धार में बहा उपभोक्ता

ड़वा तेल 80 से 85 रुपए किलो। रिफाइंड ऑयल 78 से 84 रुपए किलो। वनस्पति 75 से 80 रुपए किलो। ऐतिहासिक ऊँचाई पर पहुँच चुके खाद्य तेल बाजार में इन दिनों यही भाव चल रहा है। तिलहन के कम उत्पादन की आशंका, पड़ोसी देशों में बढ़ी माँग, आयात की आेर ध्यान न देने, वायदा कारोबारियों द्वारा अगले महीनों के लिए बोली जा रही भारी बोलियों और होली की त्योहारी माँग के कारण बढ़ी कीमतों पर रोक की संभावना भी नहीं है। बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक सरकार ने जल्दी ही इसे रोकने का प्रयास न किया तो तेल सौ रुपए किलो का आँकड़ा छू सकता है।ड्ढr बीते छह माह से खाद्य तेल बाजार में तेजी का माहौल कायम है। अक्तूबर-नवम्बर में दीपावली की त्योहारी माँग से शुरू हुआ मूल्यवृद्धि का सिलसिला जनवरी में वैट लागू होते ही बुलंदी पर पहुँच गया। इसके बाद बजट की आेर आशा भरी नजरों से देख रहा खाद्य तेल बाजार वित्त मंत्री से कोई राहत न पाकर एकदम भड़क उठा। नतीजे में बजट घोषित होने के बाद से खाद्य तेलों के दामों में 100-125 रुपए प्रति टिन(15 किलो)की तेजी आ गई है। थोक बाजार में फरवरी के अंत में जहाँ सरसों का तेल 1100 रुपए प्रति टिन के आसपास था,अब 1225 रुपए प्रति टिन पहुँच गया है। वनस्पति 0 से बढ़कर1070 रुपए प्रति टिन और रिफाइंड 1025 रुपए से बढ़कर 1120 रुपए के आसपास पहुँच गया है।ड्ढr खाद्य तेलों की कीमतों में ऐतिहासिक तेजी के पीछे बाजार में तरह-तरह के कारण गिनाए जा रहे हैं। इसमें सरसों और अन्य तिलहनी फसलों की पैदावार में 0 लाख टन की कमी की आशंका को प्रमुख कारण माना जा रहा है।ड्ढr इसी को लेकर वायदा यानी भविष्य में तिलहनों के मूल्य भी काफी तेज बोले जा रहे हैं। उत्पादन से लेकर उपभोक्ता तक के चार स्तरों पर पूरी कीमत पर वैट वसूले जाने को भी कीमतों में बढ़ोतरी का कारण गिनाया जा रहा है। पड़ोसी देशों में निकल रही माँग से जल्दी ही वहाँ भी कीमतें काफी ऊपर निकल जाएँगी। ऐसे में महँगे आयात से यहाँ खाद्य तेलों की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगा पाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगा। बिगड़ा रसोई का बजट संतोष वाल्मीकि लखनऊ। होली अभी कुछ दिन दूर है और महीने भर का राशन जुटाने में लोगों का रसोई का बजट बिगड़ चुका है। गेहूँ और आटे के भाव पहले से ही तेज चल रहे हैं। अब चीनी में भी एक रुपए किलो की तेजी है। दालें व मसाले भी आसमान छूने लगे हैं।ड्ढr लखनऊ आटा मैदा सूजी व्यापार मण्डल के अध्यक्ष तेजराम अग्रवाल का कहना है कि मौसम में नित नए बदलाव और वायुमण्डल में नमी से गेहूँ की फसल विलम्ब से आने की चर्चा है। थोक मण्डियों में अब गेहूँ का स्टॉक रहा नहीं क्योंकि जो गेहूँ यहाँ मौजूद था वह ‘वैट’ के चलते बाहर भेज दिया गया। बचे स्टॉक को आढ़ती मनमाने दाम पर बाजार में निकाल रहे हैं। लिहाजा अब नई फसल आने तक तो गेहूँ के दाम नीचे आने वाले नहीं। इतना ही नहीं चने की दाल में 300 रुपए और काली मसूर की दाल में 500 रुपए प्रति कुन्तल की तेजी आ गई। बाजार में कोई भी चावल ऐसा नहीं है जो 14 रुपए प्रति किलो से कम पर हो। मसालों के दाम भी आसमान छूने लगे हैं। नरही स्थित खुदरा दुकानदार अनिल अग्रवाल के अनुसार हल्दी, मिर्चा, धनिया आदि में 15 से 20 रुपए प्रति किलो की तेजी है। पाण्डेगंज गल्ला मण्डी के आढ़ती राजेन्द्र अग्रवाल कहते हैं कि बढ़ती महँगाई के लिए केन्द्र सरकार की नीतियाँ ही दोषी हैं। केन्द्र सरकार में अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री होते हुए भी देश में फसलों के उत्पादन और खपत पर गौर किए बिना अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार खोल दिया गया। आज देश में आम आदमी को खाने के लिए चावल मयस्सर नहीं हो रहा और उसका निर्यात किया जा रहा है।

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