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काम के बोझ से हांफ रही औषधि प्रयोगशाला

‘का पर करूं सिंगार पिया मोरे आन्हर।’ राज्य औषधि प्रशासन की स्थिति कुछ ऐसी ही बन गयी है। वह नाज भी करे तो किस बात पर। सुई, रूई, पट्टी, टैबलेट से लेकर चार हजार प्रकार के दवाओं के मिश्रण की जांच करनेवाला राजकीय औषधि प्रयोगशाला बेदम बना हुआ है। इस पर दबाव इतना कि एक्सपायरी , कोर्ट केस और सरकारी आदेश की औषधियों की जांच में छक्के छूट जाते हैं।ड्ढr ड्ढr बिहार में हर साल एक हजार करोड़ से अधिक मूल्य के दवाओं का कारोबार होता है। यहां पर सभी प्रकार की कंपनियों के औषधि उत्पाद की बिक्री होती है। औषधि प्रशासन चाहे भी तो किसी भी नकली और घटिया दवा के कारोबारी को कानून की गिरफ्त में लाना उसके लिए टेढ़ी खीर है। राज्य भर में फैले औषधि प्रशासन के जाल से विभिन्न कंपनियों के संदेहास्पद करीब 4 हजार दवाओं के सैम्पल राजकीय औषधि प्रयोगशाला में भेजे जाते हैं। प्रयोगशाला में इतनी क्षमता नहीं है कि वह सभी नमूनों की जांच कर दोषियों को सजा दिला सके। प्रयोगशाला में माइक्रोबायोलाजी संबंधी जांच नहीं होते हैं। अर्थात जितने प्रकार के इन्जेक्शन होते हैं उसकी जांच नहीं की जाती। यहां टैबलेट, कैप्सूल और सिरप की जांच की जाती है। प्रयोगशाला में सिर्फ एक सरकारी विश्लेषक बहाल है। उप-निदेशक सह सरकारी विश्लेषक और निदेशक सह सरकारी विश्लेषक का पद रिक्त है। प्रयोगशाला में कुल 30 पद स्वीकृत है जिसमें सिर्फ 10 कर्मचारी कार्यरत हैं।ड्ढr ड्ढr दूसरे औषधि प्रयोगशालाओं से इसकी तुलना की जाए तो रसायनों आदि के मद में न के बाराबर ग्रांट मिलती है। दूसरे प्रयोगशालाओं को दवाओं की जांच के लिए जहां रसायनों के लिए हर वर्ष 2-3 लाख रुपये दिए जाते हैं वहीं बिहार की इस प्रयोगशाला को सिर्फ 35-37 हजार रुपये सलाना दिये जाते हैं। यह प्रयोगशाला देश के प्राचीनतम प्रयोगशालाओं में एक है। पहले यहां पर न सिर्फ बिहार बल्कि असम, उडीसा और पश्चिम बंगाल राज्यों के नकली दवाओं की जांच होती थी।ड्ढr ड्ढr रिपोर्ट मिलने के पूर्व ही बिक जाती हैं नकली दवाएंड्ढr पटना (हि.प्र.)। राजकीय औषधि प्रयोगशाला, गुलजारबाग से नकली दवाओं की जांच रिपोर्ट जब मिलती है तब तक उस बैच की सभी घटिया दवाएं मरीज निगल जाते हैं। यह हाल है राज्य में नकली और घटिया दवा के कारोबार पर प्रभावी रोक लगाने का। सूत्रों का कहना है कि हर वर्ष राज्य भर से दवाओं के 4 हजार सैम्पल जांच के लिए प्रयोशाला भेजे जाते हैं। प्रयोगशाला में लगभग 1200 नमूनों के जांच की क्षमता है। शेष सैम्पल बैगलॉज में चला जाता है। इसका लाभ अप्रत्यक्ष रूप से दवा का गोरखघंघा करनेवाले उठाते हैं।ड्ढr ड्ढr नकली दवा की आशंका में एकत्र किये गये सैम्पल भेजने के बाद उस बैच की बिक्र पर रोक नहीं लगायी जाती। जब तक इस दवा की जांच रिपोर्ट मिलती है तब तक उस बैच की सभी दवाएं बाजार में बिक जाती हैं। लाचार प्रयोगशाला की स्थिति यह है कि वह अपनी क्षमता के अनुसार जांच करने के लिए प्राथमिकता निर्धारित करता है। जांच में प्राथमिकता उन्हीं नमूनों को दिया जाता है जिनका एक्सपायरी डेट समाप्त होनेवाला है। इसके अलावा कोर्ट केस और सरकारी आदेश के अनुसार दवा नमूनों की जांच की जाती है। अगर किसी दवा की एक्सपायरी डेट दो वर्ष बाद है और उसकी जांच के लिए केस अथवा सरकारी आदेश नहीं है तो वह दो वर्ष तक पड़ी रहेगी। इस बीच उस बैच की सभी दवाएं बिक जाती है।

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  • Web Title: काम के बोझ से हांफ रही औषधि प्रयोगशाला