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‘परमाणु करार को सार्वजनिक करे बुश प्रशासन’

अमेरिका के परमाणु अप्रसार विशेषज्ञों ने बुश प्रशासन से भारत अमेरिका असैन्य परमाणु सहयोग संधि पर सांसदों को दी गई गोपनीय जानकारी को सार्वजनिक करने की मांग की है ताकि दोनों देशों के सांसद एवं जनता को सही स्थिति का आकलन करने में मदद मिले। अमेरिकी विदेश विभाग ने अमेरिकी संसद के निचले सदन कांग्रेस में सदस्यों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए सांसदों के एक छोटे समूह को गोपनीय जानकारी दी थी और उनसे इसे एकदम गुप्त करने को भी कहा गया था। लेकिन समझौते के आलोचकों ने मांग की है कि विदेश विभाग उस जानकारी पर पड़ा गोपनीयता का पर्दा हटाए और सार्वजनिक रूप से प्रकट करे। परमाणु अप्रसार विशेषज्ञ डेरिल किम्बेल फ्रेड गोल्डरिक हेनरी सोकोलस्की एवं शेरोन स्क्वासोनी ने बुधवार 5 मार्च को एक संयुक्त बयान जारी कर यह मांग की। शस्त्र नियंत्रण संघ के कार्यकारी निदेशक किम्बेल ने बयान में कहा कि बुश प्रशासन के उत्तर को सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि अमेरिका और भारत के सांसद तथा जनता इस बात का आकलन कर सके कि क्या इस समझौते का मसौदा संसद द्वारा स्थापित नियमों एवं मानदंडों के अनुरूप है अथवा नहीं। उन्होंने कहा कि बुश प्रशासन की सवालों का जवाब देने के प्रति अनिच्छा से प्रतीत होता है कि वह अमेरिका या भारत के सांसदों से कुछ छिपाना चाहता है। विदेश विभाग ने इस पर अपनी सफाई में कहा है कि यह संधि पूरी तरह से अमेरिकी कानून के अनुरूप है तथा बुश प्रशासन ने कांग्रेस को इस बारे में विस्तार पूर्व जानकारी दी है। विदेश विभाग के प्रवक्ता टॉम कैसी ने कहा कि संवेदनशील सवालों का बहुत ऐहतियात से संतोषजनक जवाब दिया गया है तथा आगे भी उनका ऐसा ही दृष्टिकोण रहेगा। एक अन्य परमाणु अप्रसार विशेषज्ञ जान वोल्फस्टाल ने कहा कि बुश प्रशासन संभवत इस डर से उत्तर नहीं दे रहा हो कि इससे समझौते को भारत की मंजूरी मिलना कठिन हो जाएगा। उन्होंने कहा कि इसके बावजूद भी इससे चिंताएं बढ़ेंगी। उन्होंने कहा कि यदि भारतीय राजनीतिक व्यवस्था ऐसी संधि का समर्थन नहीं करना चाहती जिस पर कई तरह के प्रतिबंध लगे हैं तो हमें ऐसे समझौते नहीं करने चाहिए। ये टिकाऊ नहीं रहेंगे। अन्य बातों के अलावा अमेरिकी कांग्रेस के सदस्य विदेश विभाग से यह स्पष्ट करने की मांग कर रहे हैं कि क्या अमेरिका सरकार भारत के परमाणु परीक्षण करने की दशा में उसके साथ परमाणु व्यापार बंद कर देगा। अमेरिकी कानून के मुताबिक ऐसा करना आवश्यक है लेकिन भारत अमेरिका असैन्य परमाणु सहयोग समझौते में ऐसी शर्त नहीं रखी गई है इसकी बजाय इसमें कोई भी पक्ष किसी भी कारण के आधार पर एक वर्ष के नोटिस पर समझौता समाप्त कर सकता है। समय बीतने के साथ ये सवाल उठने लगे है कि क्या यह समझौता अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश के जनवरी 200में पद छोड़ने के पहले लागू हो पाएगा। समझौते के लागू होने की दिशा में तीन अडचनें हैं। पहली, भारत को अपने असैन्य परमाणु संयंत्र संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा उपायों के दायरे में लाने के लिए अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के साथ एक समझौता करना बाकी है। दूसरी उसे दुनिया में परमाणु कारोबार पर नियंत्रण रखने वाले 45 देशों के परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की मंजूरी लेनी होगी तथा इसके बाद अंतिम चरण में अमेरिकी कांग्रेस से आखिरी अनुमोदन कराना होगा। यह सब चार नवम्बर 2008 के राष्ट्रपति चुनाव के बाद मुश्किल हो सकता है।

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  • Web Title: ‘परमाणु करार को सार्वजनिक करे बुश प्रशासन’