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परीक्षा केन्द्र बनाने के लिए हुए छल, कपट और फरेब

ौशाम्बी और आसपास के जिलों में नकल की दुकानों को परीक्षा केन्द्र में तब्दील करने के लिए अफसरों से छल, कपट और फरेब का सहारा लिया। जिला प्रशासन ने इन केन्द्रों पर छापे डाल कर पूरे स्कूल को सामूहिक नकल में पकड़ा। सिर्फ कौशम्बी जिले के 34 कथित स्कूल काली सूची में डाल दिए गए। लेकिन अफसरों ने ‘धन उगाही’ कर इन स्कूलों को काली सूची से बाहर निकल कर फिर परीक्षा केन्द्र बना दिया।ड्ढr यह सनसनीखेज खुलासा आईएएस अन्नत कुमार सिंह ने हाल ही में सरकार को भेजी अपनी रिपोर्ट में किया है। इस रिपोर्ट से साफ होता है कि नकल मंडियों को सजाने में उप्र माध्यमिक शिक्षा परिषद के सभापति से लेकर सचिव तक का हाथ रहता है। पिछले साल की बोर्ड परीक्षा में यूपी बोर्ड ने राज्य के 10परीक्षा केन्द्रों को काली सूची से बाहर निकाल दिया।ड्ढr वर्ष 2007 की बोर्ड परीक्षा में शासन ने 614 स्कूलों को परीक्षा केन्द्र नहीं बनाने का निर्णय लिया था। इसमें 58 स्कूलों को बोर्ड के तत्कालीन सचिव वासुदेव यादव ने अपने स्तर पर काली सूची से बाहर कर दिया। परीक्षा केन्द्रों के निर्धारण के लिए यूपी बोर्ड की एक अपनी परीक्षा समिति है। सचिव ने जाँच अधिकारी को बताया कि 58 में से 10 स्कूलों को काली सूची से बाहर निकालने का फैसला परीक्षा समिति ने 23 जनवरी 2007 की बैठक में लिया था। लेकिन जाँच में पाया गया कि इस तारीख को परीक्षा समिति की कोई बैठक ही नहीं हुई थी।ड्ढr इंटरमीडिएट एक्ट में यह प्रावधान है कि आपात स्थितियों में सभापति किसी स्कूल को काली सूची से बाहर कर सकता है लेकिन उसे इसकी सूचना बोर्ड को देनी होती है। जाँच रिपोर्ट के मुताबिक बोर्ड के तत्कालीन सभापति संजय मोहन ने स्कूलों को काली सूची से बाहर निकाला लेकिन उन्होंने आपात स्थितियों का जिक्र फाइलों पर नहीं किया और न ही बोर्ड को इसकी सूचना देना जरूरी समझा।ड्ढr जाँच रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘परिषद के अधिकारी विद्यालयों को काली सूची से बाहर निकालने के लिए ‘तत्पर’ बैठे थे। जिसने भी उन्हें ‘प्रेरित’ कर लिया उसे मनोकूल आदेश मिल गया। ‘प्रेरित करने की तीव्रता’ के अनुपात में नियमों की अनेदेखी की गई।’ एक मामले में तो बोर्ड के सचिव ने कागज के टुकड़े पर ही ‘अर्ह मानें’ लिख कर आदेश पारित कर दिया। आमतौर पर सचिव काली सूची से किसी स्कूल को बाहर निकालने संबंधी आदेश पहले क्षेत्रिय कार्यालय को भेजते हैं। लेकिन सचिव ने तो सीधे काली सूची के स्कूल के प्रधानाचार्य को पत्र लिखकर क्लीन चिट दे दी।ड्ढr जाँच रिपोर्ट में लिखा गया कि काली सूची के 10ूलों को सूची से बाहर निकालने के लिए विद्यालयों से धन उगाही की कदाशयता, स्वेच्छाचारिता और सभी संबंधित की मिली भगत के संकेत मिले हैं। रिपोर्ट में साफ कहा गया कि ‘संक्षेप में कहा जाए कि परीक्षा की विश्वसनीयता एवं शुचिता बनाए रखने का दायित्व जिन्हें सौंपा गया, उन्होंने ही उसे भंग करने के सारे इंतजाम किए तो अतिश्योक्ित नहीं होगी। इसके पीछे जनहित की नहीं बल्कि शुद्ध व्यक्ित हित एवं अवैध धन उगाही की मंशा थी।’ जाँच रिपोर्ट में तत्कालीन सभापति संजय मोहन व सचिव वासुदेव यादव और सदस्य परीक्षा समिति श्रीमती एस सिंह की सम्पत्तियों की जाँच सतर्कता अधिष्ठान से कराने की सिफारिश की गई है। इनके खिलाफ दीर्घ दण्ड और विभागीय कार्रवाई की संस्तुति की गई है।ड्ढr लेकिन सूत्र बताते हैं कि यह जाँच रिपोर्ट ठंडे बस्ते में डाल दी गई। इस बारे में ‘हिन्दुस्तान’ ने गुरुवार को जब माध्यमिक शिक्षा के प्रमुख सचिव अरुण कुमार मिश्र से पूछा तो उनका कहना था कि इस जाँच रिपोर्ट पर हाईकोर्ट के कुछ निर्देश हैं। विभाग इस मामले का परीक्षण न्याय विभाग से करा रहा है। उन्होंने कहा कि दोषी कोई भी हो बख्शा नहीं जाएगा।

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