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बंदरों के हमले से वन विभाग मुख्यालय में ही मोरनी की मौत

वन विभाग मुख्यालय में ही गुरुवार को एक राष्ट्रीय पक्षी मोर की मौत गई। मुख्यालय परिसर में बन्दरों ने दौड़ाकर मादा मोर को घायल कर दिया। बचने के लिए भागी तो वन विभाग कॉलोनी की छत से गिर गई। बाद में उसे प्राणि उद्यान अस्पताल लाया गया लेकिन तब तक वह मर चुकी थी।ड्ढr एक महीना पहले भी कुकरैल नाले के पास एक मोर मरा हुआ मिला था लेकिन उसकी मौत का कारण तक नहीं पता चल सका था। गुरुवार की सुबह एक मोरनी वन विभाग कॉलोनी में छत पर नाच रही थी। वहाँ बन्दरों के झुण्ड ने उसे दौड़ा लिया। बन्दरों ने ही उसे नोंच-खसोटकर काफी घायल कर दिया। उसके बाद दौड़ते में वह एक मकान की छत से नीचे गिर गई। इससे वह काफी जख्मी हो गई। कॉलोनी में रहने वाले वन विभाग के कर्मचारी उसे उठाकर प्राणि उद्यान अस्पताल लाए। तब तक मोरनी मर चुकी थी। यहाँ अवकाश होने के कारण पोस्टमार्टम के लिए भी कोई मौजूद नहीं था। बाद में डॉ. उत्कर्ष शुक्ला को बुलवाया गया और उन्होंने पोस्टमार्टम किया। इस बारे में प्राणि उद्यान की निदेशक रेनू सिंह का कहना है पोस्टमार्टम रिपोर्ट उन्हें नहीं मिली है। रिपोर्ट मिलने के बाद ही वह कुछ बता पाएँगी।ड्ढr चाहे जहाँ इलाज कराएँ पीजीआई में करा सकते है जाँचड्ढr लखनऊ (निसं)। पीजीआई में उन मरीजों की भी जाँच संभव है जो वहाँ इलाज नहीं करा रहे हैं। किसी दूसरे अस्पताल या चिकित्सक का लिखा पर्चा दिखाना होगा। जाँच हो जाएगी। इसके लिए संस्थान में इन्वेस्टिगेशन रिवाल्विंग फंड (आईआरएफ) का भी गठन किया गया है ताकि मरीजों का परीक्षण कार्य न प्रभावित हो। यह जानकारी एक संवाददाता सम्मेलन में संस्थान के निदेशक प्रो. एके महापात्रा ने दी।ड्ढr आईआरएफ की पाँचवीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में उन्होंने कहा कि मरीजों को जानकारी नहीं है। वे कोई भी जाँच पीजीआई में करा सकते हैं। इसमें खून के अलावा एमआरआई, सीटी स्कैन व रेडियोथेरेपी विभाग की कई जाँचें शामिल हैं। वह जाँच चाहे जिस अस्पताल के चिकित्सक ने लिखी हो। यह व्यवस्था मरीजों से लाभ कमाने के लिए नहीं बल्कि गुणवत्तायुक्त सुविधा देने के लिए की गई है। प्रो.महापात्रा के मुताबिक आईआरएफ की कार्यप्रणाली साधारण है। इसमें मरीजांे को कोई असुविधा नहीं होती।

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