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मंजिल अभी दूर

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से पहले जारी विश्व श्रम संगठन (आईएलआे) की रिपोर्ट तथा न्यूयार्क से प्रकाशित फोर्ब्स पत्रिका की अरबपतियों की सूची में एक समानता तो है ही। दोनों को देखकर अंदाज लग जाता है कि भारत ही नहीं, दुनिया में महिलाआें की स्थिति काफी कमजोर है। आईएलआे ने ‘ग्लोबल एम्पलायमेंट ट्रेंड फार वूमन’ में माना कि रोजगार के बाजार में महिलाआें की संख्या भले ही बढ़ी हो, किंतु उनका कद अभी भी बौना है। तमाम कोशिशों के बावजूद लैंगिक भेदभाव जारी है, महिलाआें को पुरुषों के बराबर वेतन नहीं दिया जाता, अभिव्यक्ित की आजादी नहीं है तथा उनके मूलभूत अधिकारों का हनन होता है। घर, समाज, देश और दुनिया में आर्थिक शक्ित पुरुषों के पास है, इसलिए समानता का सपना पूरा करने के लिए शायद महिलाआें को बरसों इंतजार करना पड़ेगा। फोर्ब्स द्वारा प्रकाशित धनकुबेरों की सूची देखकर तो इस सत्य को स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं बचता। इस सूची में महिलाआें का नाम खुर्दबीन से खोजना पड़ता है। बराबरी का हक पाने के लिए महिलाआें ने लंबा संघर्ष किया है। पिछली एक सदी में उनके जीवन में बदलाव आया है, किंतु प्राप्त उपलब्धियां ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं। अच्छी बात यह है कि आज बाजार की ताकतें महिलाआें को रोजगार के क्षेत्र में खींच रही हैं। महिलाआें को जोड़े बिना श्रमशक्ित की बढ़ती जरूरत पूरा करना कठिन है। शिक्षा के विस्तार से महिला सशक्तीकरण को बल मिला है। कृषि ही नहीं, सेवा क्षेत्र में भी उनकी भारी मांग है। यह शुभ संकेत है, किंतु पद बढ़ने के साथ-साथ महिलाआें का कद बढ़ना भी जरूरी है। बराबरी की लड़ाई को केवल बाजार की शक्ितयों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। संगठित संघर्ष की जरुरत अब पहले से अधिक है। वैश्वीकरण और उदारीकरण की आंधी में महिलाआें को सम्मान नहीं सेक्स सिम्बल बनाने की होड़ लगी हुई है। ऐसे में समस्या की सच्ची तस्वीर सामने नहीं आ पाती। मसलन बाजार चलाने वालों को भारत में कन्या भ्रूण हत्या से कोई सरोकार नहीं है, इसलिए इस गंभीर समस्या पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा। देश में महिला-पुरुष अनुपात घटकर : 1000 के खतरनाक स्तर पर आ चुका है। निश्चय ही देश में रोजगार के मोर्चे पर महिलाआें का दखल बढ़ा है किन्तु यहां भी सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि 0 प्रतिशत महिला श्रमशक्ित असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है। असंगठित क्षेत्र का मतलब है अनिश्चित रोजगार, कम वेतन और खूब शोषण। गरीबी और महिलाआें की दुर्दशा को अलग करके नहीं देखा जा सकता क्योंकि गरीबी की मार सबसे पहले और सबसे अधिक महिलाआें को सहनी पड़ती है। महिला सशक्तीकरण का मतलब है आर्थिक सत्ता के केन्द्र का हस्तांतरण। देर-सबेर यही करना पड़ेगा।

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