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साइबरफेमिनिम - मुक्ित की नई राह

जब हम इंटरनेट पर ऑनलाइन होते हैं, अपनी ई-मेल देखते हैं, या अपने पसंदीदा साइट को सर्फ करते हैं तो अक्सर हम इस बात पर ध्यान नहीं देते कि हम उस सामाजिक परिवर्तन से गुजर रहे हैं जिसने हमारी जिंदगी को बदल दिया है। हम यह जरूर मानते हैं कि इंटरनेट ने हमारी जिंदगी को कई तरह से आसान कर दिया है। लेकिन इसके साथ ही हमें यह भी देखना चाहिए कि इंटरनेट में समाज को बदलने की क्या संभावनाएं छुपी हुई हैं। इंटरनेट संचार तकनीक जब शुरू हुई थी तो इसे न्यू मीडिया कहा गया था। तब यह माना गया था कि इंटरनेट खबरों और घटनाआें की जानकारी का एक नया माध्यम बन जाएगा। और इंटरनेट काफी हद तक यह करता भी है। लेकिन इसकी असली ताकत लोगों को और विचारों को जोड़ने में है। अगर हम इसे महज न्यू मीडिया भर मान लेते हैं, तो हम मेल-मिलाप और एक्िटविम के इस सक्रिय माध्यम का सही इस्तेमाल नहीं कर पाते। यह सिर्फ मीडिया ही नहीं बल्कि नारीवाद के लक्ष्य को हासिल करने का एक औजार भी है। इंटरनेट जब शुरू हुआ तो नारीवादियों का लक्ष्य सीधा सा था - ज्यादा से ज्यादा औरतों को इससे जोड़ना। 1तक इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों में महज 15 फीसदी ही औरतें थीं। बाद में यह प्रतिशत बढ़ा और तेजी से बढ़ा। लेकिन इस पर से पुरुषवादी असर खत्म नहीं हुआ। इसकी ज्यादातर सामग्री पर पुरुषों का नियंत्रण है। मुनाफा पुरुषों के पास जाता है। फिर पुरुष और महिलाएं इंटरनेट पर कैसा बर्ताव करते हैं इसे लेकर एक जेंडर गैप भी है। पुरुष एक साइट से दूसरे साइट पर कूदते-फांदते हुए सर्फ करते हैं, जबकि महिलाएं सीधे उसी साइट पर जाती हैं, जहां से उन्हें जानकारी चाहिए। इसलिए इंटरनेट को इस तरह बनाए जाने की जरूरत शुरू से ही थी कि इंटरनेट पर औरतें खुद को एक-दूसरे से जोड़ सकें। एक बार जब इंटरनेट पर आएं तो खुद को महिला संगठनों और संसाधनों से जोड़ सकें। इसके लिए समान सोच वाले संगठनों को हाइपरलिंक के जरिये जोड़ा जा सकता था ताकि एक वचरुअल सिस्टरहुड बन सके। शुरू में महिलाआें के बहुत कम ही साइट थे। नारीवाद इंटरनेट पर एक सिरे से नदारद था। आईविलेज, आक्सीजन और वुमन डॉट कॉम जैसे महिलाआें के व्यावसायिक साइट आए तो नारीवाद भी आ ही गया। शुरू में नारीवादी साइट के पास समस्याआें के समाधान के लिए ई-मेल आते थे। ज्यादातर पीड़ित महिलाआें के। कि सी के साथ बलात्कार हुआ तो किसी कि साथ र्दुव्‍यवहार, किसी के साथ महिला होने के कारण दफ्तर में भेदभाव। ई-मेल ने बहुत-सी महिलाआें को यह सुविधा दी कि वे अपनी पहचान छुपा कर अपनी परेशानी भी बता सकती थीं और अपना गुस्सा भी व्यक्त कर सकती थीं। सबसे पहले इंटरनेट से नई पीढ़ी जुड़ी, इसलिए ज्यादातर ई-मेल 18-25 बरस की लड़कियों ही थीं। इंटरनेट ने नई पीढ़ी की इन लड़कियों को नारीवाद से जोड़ दिया। ये ई-मेल दुनियाभर से आते थे। इंटरनेट ने इन औरतों को एक विश्वव्यापी लहर का हिस्सा होने का एहसास दिया। कार्यकर्ताआें के लिए यह एक अच्छा अवसर था, वे उन मसलों को आसानी से समझ सकती थीं जो दुनियाभर की औरतों पर असर डाल रहे हैं। पहले औरतें और लड़कियां कंप्यूटर तकनीक से दूर ही रहती थीं, इंटरनेट ने तकनीक के इस संकोच और डर से मुक्ित का अवसर दिया। आज लड़के, लड़कियों दोनों ही को स्कूल में बहुत छोटी उम्र से ही कंप्यूटर सिखा दिया जाता है। अनीता बोर्ग ने कंप्यूटर की जानकारी रखने वाली ऐसी पीढ़ी के लिए ही इंस्टीटय़ूट फॉर वुमन इन टेक्नोलॉजी स्थापित की है। सैंडी लर्नर और केट मुथर जैसी औरतें सिस्को सिस्टम के संस्थापकों में रही हैं। लेकिन इंटरनेट ने एक और सुविधा दी - इसने बहुत सी औरतों को वह जरिया दिया कि अब वे अपने घर पर ही बैठकर काम कर सकती हैं। उनके लिए बच्चों और दफ्तर में से किसी एक को चुनने की मजबूरी नहीं है। बहुत-सी कंपनियां भी अब औरतों को घर पर ही रहकर काम करने की इजाजत देने लगी हैं। ये काम पार्ट टाइम भी हैं और फुल टाइम भी। औरतों के साथ ही पुरुषों को भी घर पर रहकर काम करने का मौका मिल रहा है इसलिए अब वे बच्चों के पालन पोषण में बराबर का हाथ बंटा सकते हैं। जाहिर है कि यह ट्रेंड हमें बराबरी की आेर ले जा रहा है। बहुत सी माएं अब ऐसे ऑनलाइन कारोबार का संचालन कर रही हैं जो घर से ही चलाए जा रहे हैं। वुमन आेंड बिानेस डॉयरेक्टरी में ऐसी औरतों के साइट की संख्या लगातार बढ़ रही है जिनके छोटे छोटे बच्चे हैं। ये औरतें बहुत से ऐसे उत्पादों को बेच रही हैं जिनका उन्होंने खुद तजुर्बा हासिल किया है, जैसे छोटे बच्चों का सामान। दिलचस्प बात यह है कि औरतों को जब मौका मिलता है तो वे अपने मूल्य खुद बनाती हैं। मसलन ईकोमेल में पर्यावरण प्रेमी कंपनियों की जो फेहरिस्त है उनमें से लगभग आधी का स्वामित्व महिलाआें के पास है। लेकिन इंटरनेट पर सब कुछ इतना अच्छा ही नहीं है। औरतों और नारीवादियों के खिलाफ नफरत इंटरनेट में कुछ ज्यादा ही दिखाई देती है - एक क्रूर नफरत जिस पर किसी तरह का कोई सेंसर नहीं। इंटरनेट ने जितना भला नारीवाद का किया उससे ज्यादा महिला विरोधियों का, पोनर्ोग्राफी का और कट्टरपंथियों का किया है। औरत को निकृष्ट बताने वाले और उसके खिलाफ नफरत फैलाने वाले ऐसे बहुत से साइट हैं जिन पर कोई लगाम नहीं कसी जा सकती। तकनीक की यह क्रांति तो अभी शुरू भर हुई है। हम उस वायरलेस भविष्य की आेर बढ़ रहे हैं जहां इंटरनेट, टेलीविजन और टेलीफोन सब मिलकर एक हो जाएंगे। तकनीक का विस्तार होगा तो कीमतें घटेंगी और वह गरीबों तक पहुंचेगी। इन गरीबों में ज्यादातर महिलाएं ही हैं। जब हम इंटरनेट के किसी चैट रूम में पहुंचते हैं तो हमें पता नहीं होता कि वहां मौजूद लोगों का लिंग क्या है, उनकी उम्र क्या है, उनकी जाति क्या है, उनका देश क्या है। यही हर तरह के भेदभाव और शोषण से लड़ने की अवधारणा भी है। इंटरनेट के जरिये मानव जाति को विकास की वह राह मिली है, जो हमें ज्यादा एकताब, ज्यादा जागरूक और ज्यादा लोकतांत्रिक बनाएगी। इस वचरुअल सच को हमें पूर्ण सच में बदलना होगा। फेमिनिस्ट डॉट कॉम से साभारड्ढr लेखिकाएं फेमिनिस्ट डॉट कॉम की संस्थापक हैं

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