DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

वह मुंह और मसूर की दाल?

किसी जमाने में मूंग और मसूर की दाल की तुलना खाने वाले के मुंह से की जाती थी। दाल चाहे किसी की भी हो, यह गरीबों के भोजन में अति लोकप्रिय मानी जाती थी। मूंग व मसूर की दाल को एक विशिष्ट भोज सामग्री का दर्जा प्राप्त होता था। हमारे देश में सर्वाधिक लोग मूंग व मसूर की दाल का ही सेवन अपने भोजन में करते आ रहे हैं। यूपीए सरकार सत्ता पर काबिज हुई तो अरहर, मूंग व मसूर की दाल के थोक भाव वर्तमान से 43 प्रतिशत कम थे। केवल चार वषरे में ही इन दालों के थोक मूल्यों में 43 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो गई। गेहूं व चावल में 36 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो गई।ड्ढr किशन लाल कर्दम, उत्तम नगर, नई दिल्ली पर्यावरण पर नार रहे अमेरिका के कुछ वैज्ञानिकों ने हाल ही में स्पष्ट रूप से कहा है कि पर्यावरण से खिलवाड़ इंसान को बहुत महंगा पड़ेगा। जंगलों को समाप्त कर बनाई गई सड़कें, इमारतें, पशुघर, मुर्गीपालन केन्द्र व फार्म हाउस एवं जीन के रूपांतरण पर आधारित फसलों (जीएम) की खेती बर्ड फ्लू, एड्स व अन्य कई अनजाने रोगजन्य वायरसों को निमंत्रण देगी। पर्यावरण अपने साथ छेड़छाड़ महसूस नहीं करता है अपितु पलट कर वार करता है। पश्चिमी बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ वर्ष पूर्व फैला मलेरिया मेंढकों की संख्या आधी रह जाने का ही परिणाम था। रोग महामारी का रूप न ले इस हेतु उचित पर्यावरण प्रबंधन एवं संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।ड्ढr डॉ. आे. पी. जोशी साइंस कालेज, इंदौर कुछ तो भला करो किसानों का पिछले कुछ दिनों से संसद से सड़क तक, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से लेकर सभी जगह किसानों की चर्चा होने से संकेत मिलने शुरू हो गए हैं कि देश में निकट भविष्य में आम चुनाव होने वाले हैं। चाहे सत्ताधारी पार्टी हो या विरोधी सभी की डफली से एक ही राग निकल रहा है कि किसानों का भला हो। अरे इनका तो भला होना ही चाहिए क्योंकि यही लोग तो धूप, पानी की चिंता किए बिना सभी देशवासियों का पेट भरते हैं। परंतु हालात को देखकर यही कह सकता हूं कि आजादी के इतने दशकों के बाद भी इन गरीब किसानों के वोट तो हमारे राजनेताआें ने ठग कर अपनी अट्टालिकाएं बनवाईं, अपना बैंक बैलेंस बढ़ाया, परंतु ये बेचारे मौत को गले लगाने पर मजबूर होते गए। अगर केवल संसद में शोर मचाने और नारेबाजी करके किसानों की समस्या का हल निकलना होता, तो कब का निकल गया होता। इसलिए कृषि क्षेत्र के विकास व प्रगति के लिए सार्वजनिक ढांचा मजबूत करने के साथ ही आधुनिकतम मशीनों का इस्तेमाल करने की पहल होनी चाहिए।ड्ढr पीकेझा ‘लल्लन’, रमेश नगर, नई दिल्ली पाक की किस्मत ‘कितने पास कितने दूर’ (संपादकीय 28 फरवरी) पढ़ा। भारत गठबंधन की दलदल में धंस चुका है और अब यही कुव्यवस्था पाकिस्तान के सामने मुंह बाए खड़ी है। मरहूम बेनजीर भुट्टो और नवाज शरीफ दोनों ही पार्टियों के नेता मुशर्रफ के हाथों प्रताड़ित व अपमानित हो चुके हैं। दोनों पार्टियों को इतना बहुमत मिला नहीं कि वे अपने बूते पर सरकार का गठन कर सकें। गठबंधन करना उनकी मजबूरी है और समय का तकाजा भी। पर वहां के हालात तो यह बता रहे हैं कि जिस प्रकार ये दोनों पार्टियां व्यवहार कर रही हैं, उससे तो ऐसा लग रहा है कि मियां मुशर्रफ का बाल भी बांका होने वाला नहीं है, क्योंकि इनकी आपसी फूट के अतिरिक्त पाक राष्ट्रपति पर अमेरिकी राष्ट्रपति का हाथ है। जरा देखिए बेचारी पाक जनता को कि चुनाव के लगभग एक माह बाद भी उन्हें लोकतंत्र की सरकार नसीब नहीं हुई और यदि होगी भी तो वह शायद उनकी आकांक्षाएं पूरी नहीं कर पाएगी।ड्ढr इन्द्र सिंह धिगान, किंग्जवे कैम्प, दिल्ली माया का डर माया का सत्ता में आने का डरड्ढr सभी पार्टियों के दिल में कर गया घरड्ढr बरसाती नेता कांप रहे थर-थरड्ढr जनता चाहती है अब इनको दूर करड्ढr कट ही जाने चाहिए, भ्रष्टाचार के परड्ढr वेद, मामूरपुर, नरेला, दिल्लीं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: वह मुंह और मसूर की दाल?