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राजरंग

महिला ही जाने महिला का मर्मड्ढr महिलाआें और बच्चों के कल्याण का काम यदि किसी महिला को मिले तो इससे अच्छा और क्या हो सकता है। महिलाआें की भलाई के लिए सूबे की एक मात्र महिला वजीर को यह जिम्मा सौंपा गया है। मैडम महिलाआें को मझधार से निकालकर उन्हें सशक्त बनाने का जज्बा तो दिल में रखती हैं, लेकिन किरानी और बाबू उनकी इस दिली तमन्ना को सफलीभूत होने ही नहीं देते। कुछ न कुछ दांव-पेंच लगाकर सारी योजनाआें पर पानी फेर देते हैं। एक दिन के बाद इंटरनेशनल वीमेंस डे है। मैडम कशमकश में है कि हम क्या करें, जिससे महिलाएं सबल हों। अब तक तो कुछ भी नहीं कर पाये हैं। एक दिन में महिलाआें को बराबरी का दर्जा तो नहीं दिलया जा सकता। इसी को लेकर मैडम चिंता में पड़ी हुई हैं। अधिकारियों को आदेश दे रही हैं यह कीजिए वह कीजिए। पीए और सलाहकारों से भी मंत्रणा कर रही हैं। कह भी रही हैं कि कितना अच्छा होता कि आपलोग पहले याद दिला देते। मैडम की फितरत यह भी है कि वह कभी बिना लालबत्ती के रह ही नहीं सकती। बिहार से लेकर झारखंड तक इसका इतिहास गवाह है। वह भी अब समझ रही हैं कि फ्यूचर सेफ करने के लिए ताम झाम छोड़कर महिलाआें के बीच जाना होगा।

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