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परधानी का परचम संभाला और उड़ चलीं खुले आकाश में

उम्र का एक ऐसा पड़ाव, जब शक्ित क्षीण होने लगती है! बच्चे उनकी अनदेखी करते हैं..ऐसे दौर में भी वे बिजली, सड़क, पानी, चिकित्सा सेवाएँ गाँव तक लाने के लिए संघर्षरत हैं! वे राजनीतिक विरोधियों को मात देने के लिए बिसात बिछाती हैं और उनके चक्रव्यूह को भेदने का साहस भी रखती हैं-ये बातें हैं उन महिला प्रधानों की, जो तमाम बंधनों से मुक्त होकर खुद ‘परधानी’ का परचम संभाल रहीं हैं। अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस पर ‘महिला प्रधान उत्सव’ में हिस्सा ले रही प्रधानों के संघर्ष की दास्तान, उनके उड़ान की कहनी खुद-ब-खुद बयान करती हैं।ड्ढr ‘महिला समाख्या’ ने कई साल पहले ग्रामीण महिलाओं में संघर्ष का जज्बा भरा। फिर उन्हें कामयाबी का मूलमंत्र दिया-‘अधिकार का लेना ही जीत नहीं बल्कि अधिकार का सही व सार्थक प्रयोग ही असली जीत है!’ वर्ष 2005 के पंचायती चुनाव में 604 महिला समाख्या समूह बनाए। बड़ी संख्या में समूह की सदस्य प्रधान के चुनाव में कूदीं और 6महिलाएँ प्रधान भी बन गईं। अब हर प्रधान ग्राम पंचायत से लेकर कलक्टर के दरवाजे तक हक की आवाज बुलंद कर रही है। इलाहाबाद के बिरहा करपिया ग्राम पंचायत की प्रधान अभिराजी निरक्षर है लेकिन राजनीतिक चातुर्य उसमें कूट-कूट कर भरा है। वह बताती हैं कि गाँव में खड़ँजा लगवा रही थी, विरोधियों ने कुछ लोगों को गोलबंद किया और धरने पर बैठ गए। कुछ सदस्यों ने भी धमकाया कि ‘प्रधानी’ ले लेंगे, वह खुद धरनास्थल पहुँची। सबके सामने ही पूछा-सड़क बनने से क्या गाँव का नुकसान है? लोगों को बात समझ में आ गई, धरना खत्म हो गया। मछलीशहर के गौरहा की प्रधान और हाई स्कूल शिक्षित पुष्पादेवी कहती हैं कि वे पंचायत भी करती हैं, समस्याएँ सुलझाने को आतुर रहती हैं। रामूडीहा गोरखपुर की प्रधान सुमित्रा कहती है, प्रधान हम हैं, यह पूरे गाँव को दिखा दिया है।ड्ढr चित्रकूट के निही चिरैया गाँव की सोनिया पाँच वोटों से प्रधानी का चुनाव हारी लेकिन उन्होंने संघर्ष की राह नहीं छोड़ी.. इलाके के बाहुबलियों के जुल्म के खिलाफ वह सदैव आगे रहती हैं। इलाहाबाद के डेरावारी की ग्राम प्रधान फूलकली को तो दबंग गोली मारने की धमकी दे रहे हैं, लेकिन वह मुकाबला करने को तैयार हैं। मथुरा के ऑजनोक गाँव की श्यामवती दाई का कार्य करती हैं, वह कहती हैं प्रधान चुने जाने के बाद भी लोग बराबर नहीं बैठाते, लेकिन फर्क नहीं पड़ता। प्रधान हैं, तो गाँव में कब्जा नहीं होने देंगे। जच्चा-बच्चा केन्द्र बनवा दिया है, ताकि कोई ऐसे तानों का शिकार न हो। सिर्फ ये महिलाएँ ही नहीं बल्कि ‘महिला समाख्या’ के तत्वावधान में गोमतीनगर के ‘सौभाग्यम गेस्ट हाउस’ में एकत्रित हर महिला प्रधान अपने आप में संघर्ष की एक मिसाल है।

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