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आपकी सरकार आपके द्वार‘आपकी सरकार आपके द्वार’!

ये एक सरकारी योजना का नाम है। जैसा कि नाम से जाहिर है कि इसके तहत सरकार नाम की कोई चीज या पदार्थ आपके दरवाजे पर आयेगा। अभी ये स्पष्ट नहीं है कि आगंतुक कटोरा लेकर आएगा या किसी कंपनी के सेल्समैन की तरह ब्रीफकेस लेकर। ये भी स्पष्ट नहीं है कि दरवाजे पर आने का कार्यक्रम सवेरे होगा या दोपहर को, या शाम या आधी रात को। हालांकि, आधी रात को आने का कापीराइट उन लोगों के पास है, जो कट्टा, पिस्तौल, तमंचा- चाकू आदि नाना प्रकार के अस्त्र- शस्त्रों से सुसज्जित होकर आते हैं। आतिथ्य ग्रहण करते हैं और जाते वक्त घर का सारा माल दक्षिणा के रूप में समेट ले जाते हैं।ड्ढr ड्ढr वैसे सरकार का दरवाजे पर आना बड़ी बात है। मेरे पड़ोसी के दरवाजे पर अक्सर एक सरकारी वर्दी आती रहती है। इस वर्दी के भीतर उन पड़ोसी का दोस्त रहता है, जिसे पुलिस विभाग से वेतन व धुालाई भत्ता मिलता है। वर्दी का रोब इतना है कि वेतन का जुगाड़ मार्केट से और भत्तों का ‘भक्तों’ (अपराधियों) से होता रहता है। जरा सोचिये कि जब मामूली सी सरकारी वर्दी का इतना जलजला है तो खुद सरकार का कितना होगा। और, जब वही सरकार आपके द्वार आयेगी तो सोचिये कि पड़ोसी आपके भाग्य से ईष्र्या क्यों नहीं करेंगे।ड्ढr ड्ढr लेकिन, मेरे एक पड़ोसी अपने घर के आसपास डीडीटी का छिड़काव करा रहे थे। मैंने उनसे कारण जानना चाहा तो बोले - ‘ऐहतियात जरूरी है। क्या ठिकाना, कहां- किससे- कैसे इंफेक्शन हो जाए। मैं तो बच्चों को भी हेपेटाइटिस बी का टीका लगवाने जा रहा हूं।’ चौराहे पर अलग किस्म की बहस जारी थी। लोगों में सरकार की शक्ल को लेकर मतभेद थे। कुछ के अनुसार सरकार की सूरत विधायकों- मंत्रियों जैसी होती है तो कुछ का कहना था- नहीं, अधिकारियों जैसी। जबकि, कुछ के मुताबिक सरकार निराकार है। उसे महसूस किया जा सकता है, देखा या छुआ नहीं जा सकता। मतभेद इस बात पर भी था कि सरकार को रंगहीन, स्वादहीन, गंधहीन मानना चाहिए या नहीं। कुछ डीएनए टेस्ट की सलाह दे रहे थे। मगर उसमें कुछ राजनीतिज्ञों की पोल- पट्टी खुल जाने का खतरा था। अपने को खानदानी कांग्रेसी बताने वालों के पैजामे के नीचे हाफ पैंट और समाजवादी झंडा बुलंद करने वाले पूर्व लाल सलामी निकल सकते थे। बहरहाल, जितने मुंह, उतनी बातें।ड्ढr ड्ढr मैंने ग्रामीण क्षेत्रों में भी जायजा लिया। दरवाजे पर सरकार आने की वहां भी सुगबुगसहट थी। एक झोपड़े के आगे एक बकरी बंधी थी। उसे एक छोटी लड़की चारा खिला रही थी। हर आेर चहल- पहल थी। लोग आ- जा रहे थे। उसकी मां को कुछ खटका हुआ तो उसने भीतर से पूछा - ‘बेटी कौन है?’ड्ढr ‘कोई नहीं मां, प्रधान जी आ रहे हैं।’ड्ढr ‘तो बकरी का चारा भीतर ले आ।’ड्ढr कुछ देर बाद फिर भीतर से आवाज आई - ‘अब कौन है?’ड्ढr ‘मां, विधायक जी हैं!’ड्ढr ‘तो तू भीतर आ- जा।’ड्ढr कुछ पल और बीते तो फिर आवाज आई - ‘तू आई नहीं अभी तक, अब कौन आ रहा है?’ड्ढr ‘मां, इस बार साक्षात सरकार है।’ड्ढr ‘तो बकरी को भी अंदर कर ले!’

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