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चीखते रहे कर्मचारी बरसती रहीं लाठियां

आत्मदाह करने वाले कर्मचारियों को बचाने के बदले पुलिस उनपर लाठियां बरसा रही थी। आग की लपटों में घिरे कर्मचारी चीख रहे थे, दूसरी तरफ पुलिसकर्मी निहत्थों पर ‘मर्दानगी’ दिखा रहे थे। किसी के सिर पर चोट लगी, तो कोई औंधे मुंह गिरा। प्रोजेक्ट बिल्डिंग में बैठे अफसर ‘तमाशा’ देख रहे थे और उनका हुक्म बजानेवाले सुरक्षाकर्मी कर रहे थे ‘बहादुरी’ का प्रदर्शन। सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि ये कर्मचारी पिछले तीन माह से सचिवालय गेट पर हर रोज दोपहर डेढ़ से तीन बजे दिन में धरना दे रहे थे।अपनी मांगों के समर्थन में हर रोज नारेबाजी करते इन कर्मियों की ‘आवाज’ किसी ने नहीं सुनी और जब मामला इस मोड़ पर पहुंच गया तो अफसर पल्ला झाड़ने और दामन बचाने की कोशिश में जुट गये हैं। मंत्री से लेकर आला अफसर तक ‘तत्परता’ का स्वांग रच रहे हैं।ड्ढr झारखंड राज्य सचिवालय चतुर्थवर्गीय कर्मचारी संघ के बैनर तले जो आंदोलन चल रहा था, उसमें यह निर्णय ऐलानिया तौर पर ले लिया गया था कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गयीं तो वे एक-एक कर आत्मदाह करेंगे। किसी ने उनकी मांगों को गंभीरता से नहीं लिया। संघ के महासचिव अतिश झा के हस्ताक्षर से 25 फरवरी को ही रांची के उपायुक्त, सिटी एसपी, सदर अस्पताल के अधीक्षक, सुरक्षा के प्रभारी डीएसपी और अन्य अधिकारियों को सूचना दी गयी थी। एसडीओ के स्तर से वहां मजिस्ट्रेट की तैनाती तक नहीं हुई। सच तो यह है कि घटना के बाद एसडीओ कार्यालय में यह पता लगाने की कोशिश की जा रही थी कि कर्मचारियों द्वारा ज्ञापन दिया गया है कि नहीं। ज्ञापन में आत्मदाह करने वाले कर्मचारियों के नाम भी अंकित हैं। इतना सब कुछ होने के बाद भी किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। सचिवालय की सुरक्षा में तैनात पुलिस और दूसरे अफसरों का कहना है कि सचिवालय में आत्मदाह करने या क्षति पहुंचाने की इजाजत नहीं है। सुरक्षा के लिए उन्हें तैनात किया गया है। वे मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकते। कर्मचारी पेट्रोल और केरोसिन के जार लेकर जुलूस की शक्ल में प्रोजेक्ट भवन पहुंचे। तैयारी पहले से थी। इस घटनो को रोका जा सकता था। आंदोलन कर रहे कर्मचारियों को समझाने की बजाय उन्हें पीटा गया। ड्ढr

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