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ये मार्च का महीना है, सीजन है..

हिन्दी सेवियों को मार्च का महीना मारे डाल रहा है। सीजन है। ‘बहुत बिजी’ हो उठे हैं। यहां उतर रहे हैं। वहां चढ़ रहे हैं। टू टायर, थ्री टायर में लदे हैं। भीड़ यानी ‘जनता’ के धक्के झेल रहे हैं। धक्के हिन्दी की सेवा की मेवा हैं। सर्वत्र मिलते है। इनदिनों महाराष्ट्र में मिल रहे हैं। वीर पुरुष उसे हंसकर झेलते हैं। मार्च का महीना हिन्दी-सेवा का महीना होता है। इसी में पूरे साल का लेवा-देवा होता है। जिस तरह किंशुक सड़कों के किनारे अचानक फूट उठता है लाल पीला बड़ा-बड़ा सा दहकने लगता है, उसी तरह हिन्दी सेवा से भरे-भरे ये विचार-टेसू यत्र-तत्र-सर्वत्र खिलने लगते हैं। मार्च के मस्त महीने में स्कूल कॉलेज विश्वविद्यालयों के विभाग सक्रिय हो उठते हैं। साल भर थपक-थपक कर सुलाई गई साहित्य सभाआें परिषदों सम्मेलन कार्यशालाआें का आवाहन किया जाता है। उनमें प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। जगाया जाता है। पूरे साल जिसे टरकाते आए हैं उस हिन्दी को संपन्न करना ही होता है। नहीं करेंगे तो बजट लैप्स हो जाएगा। हिन्दी वाला लैप्स शब्द से बहुत डरता है। सब काम लैप्स करवा सकता है। पढ़ाई-लिखाई लैप्स कर सकता है, मगर घर आई लक्ष्मी को ठुकरा नहीं सकता। हिन्दी के बजट को लैप्स नहीं कर सकता। जान चली जाए पसा न जाए। उसका स्वभाव होता है सो वह काम में लग लेता है। मार्च ही महीना है जो अखिल हिन्दी सेवियों केा एक सूत्र, एक भाव में बांध देता है। मार्च में सब एक साथ मार्च पास्ट करने लगता है। एक अटैची एक झोला, झोले में एक ठो रेलवे समय सारिणी और चेहरे पर हिन्दी सेवन की चमक लिए वे किसी तरह किसी डिब्बे में अपनी सीट तलाशते हैं। जिस तरह शोधार्थी किसी संदर्भ को तलाशता है वे सीट बर्थ तलाशते हैं। शोध पद्धति यहां सबसे ज्यादा काम आती है। मार्च के महीने में हिन्दी सेवी का रोजनामचा बहुत भरा-भरा होता है। कोलकाता जा रहे हैं फिर कानपुर जाना होगा अगले दिन दिल्ली में दो कार्यक्रम हैं फिर रायुपर का है उसके बाद दो दिन सेठ मटरूमल कन्या महा विद्यालय का है, फिर नागपुर में है। वर्धा अरे वहां का तो भूल ही गया। तीन दिन का है। ये लीजिए इनकम टैक्स वाले हिन्दी सेवा के भाव से भर उठे हैं। इधर वे भी करा रहे हैं। ये रहे अंडमान में हिन्दी वाले, वे वहां हिन्दी की सेवा कर रहे हैं और मॉरीशस वहां भी तो जाना होगा.. इस मार्च के महीने ने हिन्दी सेवियों को बहुत-बहुत दिया है। एक डायरी, ‘हाउ टू से नो व्हेन यू वांट टू से यस’ की दुर्लभ मैनेजमेंटी कला, एक ठो मोबाइल, और एक्स्ट्रा इनकम संभालने की कला।डायरी रखने की कला कहती है कि बात करने से पहले जेब से डायरी निकाल लें। क्या पता सामने वाला कोई डेट ही मांगले। अगला कदम है : एकदम हां नहीं करना है। पहले ना करना है कहना है :भई खाली नहीं हैं। ‘बहूत बीजी’ हैं। फिर अहसान जताते हुए कहना कि चलो निकालते हैं समय। फिर डायरी पर आप लिखते हैं ‘समय’। तीसरा आइटम मोबाइल है। मार्च में बहुत बिजी रहता है। सब हाथ में मोबाइल रखने लगे हैं। अब वे चौबीस घंटे ही सेवा केलिए उपलब्ध है। मन ही मन मोबाइल को सराहते हैं, गजब की चीज है भई ये तो। मंच पर बैठकर कान पर लगाकर बातें करने लगते हैं। ‘किसी-को- डिस्टर्ब -नहीं-करना-है’ वाले उदात्त भाव से बिना शोर किए उठते हैं और एक हाथ कान पर दूसरा कमर पर मंच के कोने में जाकर धीरे धीरे बतियाने लगते हैं। मार्च के महीने की आखिरी उपलब्धि बाजार का आइडिया है। वह विषय भी है। विषयी भी। वह भक्ष्य है और लक्ष्य भी। विषय कुछ भी हो सब मिलकर बाजार पर पिल पड़ते हैं। मारते-मारते थक कर सुस्ताने लगते हैं। साहित्य का वित्ताधिकारी भी ताली बजाने लगता है : सर जी आप ने अच्छा बोला। ये लीजिए। मानदेय है। यहां दस्तखत कर दीजिए। टिकट दे दीजिए आेए बलबीर ले लेना सर से। वह निकल जाता है अब बलवीर ही तकदीर है हिन्दी की।जो साहित्य अभी हुआ है वह सब गायब है हाथ में लिफाफा साहित्य की जगह ले लेता है। लिफाफे की अंतर्वस्तु को भांपा जा रहा है। खोल कर देखा, गिना जा रहा है। हिसाब चल रहा है यहां तो सिर्फ इतने ही मिले। कुल पांच सौ एक हजार। और लीजिए ये टूटे पसे भी मिले हैं। साहित्य कहीं सो गया है तुलनात्मक अध्ययन होने लगा है, अरे वहां तो इतने मिले थे ये बड़े घटिया लोग हैं, सिर्फ इतने दिए हैं। उनको भी इतने दिए हैं, मैं क्या कम हूं। मैं क्यों आया? मार्च का महीना साहित्य के संयोग-वियोग का होता है। संयोग हुआ कि वित्ताधिकारी बीच में आकर ‘वियोग’ की स्थिति पदा कर देता है।

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