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‘कुर्सी’ और ‘धन’ से सब करेंगे ठीक

पाकिस्तान चुनाव आयोग ने आखिरकार चुनाव के सरकारी नतीजे शनिवार को घोषित कर दिए। केन्द्र और प्रांतों में सरकारें बनाने का न केवल समय आ गया है बल्कि बड़ी देर हो रही है। जहां तक प्रांतों का सवाल है सिवाए बलूचिस्तान के तस्वीर साफ है। पंजाब में मुस्लिम लीग (नवाज), सिंध में पीपीपी, फ्रंटियर में अवामी नेशनल पार्टी अपनी सरकारें बना लेगी। बलूचिस्तान में जहां मुस्लिम लीग (कायद) यानी पहली सरकारी लीग, सबसे आगे है, पर हालात के चलते शायद सरकार न बना सके। यहां पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी जो दूसरी सबसे आगे की पार्टी है, अवामी नेशनल पार्टी और अन्य के साथ मिल कर सरकार बनाने की ताकत रखती है। यह ख्याल किया जाता है कि सरकारी लीग के कई सदस्य इनसे मिल सकते हैं। असली खेल तो केन्द्र में खेला जाएगा। नवाज शरीफ अपनी बातें- जैसे निकाले हुए जजों की बहाली, मुशर्रफ के इमरजेंसी के जजों का निकाला, मुशर्रफ के नवम्बर के बाद के संविधान संशोधन को रद्द करने का मुद्दा, मुशर्रफ से शपथ न लेने का इरादा और मुशर्रफ की सरकार रद्द करने की ताकत को न मानना इत्यादि शामिल है, पर अड़े हुए हैं। वह तो इस मुशर्रफ को बाहर भेजना ही नहीं बल्कि कारगिल के बारे में सरकारी जांच बैठाने पर अड़े हुए हैं। इधर पीपीपी मुशर्रफ से टक्कर नहीं लेना चाहती और मानती है कि सरकार बना कर सबके साथ मिलजुल कर काम करना पहले जरूरी है। जहां वह एमक्यूएम को भी साथ लेना चाहती है, नवाज इसके बिल्कुल खिलाफ हैं। वह कहते हैं कि इन लोगों ने दंगे कर हमारे दर्जनों साथी मार दिए। इस पर ‘डॉन’ ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि लोगों ने चुनाव से यह जाहिर कर दिया है कि जनता किसी एक पार्टी की तानाशाही नहीं चाहती बल्कि एक मिलीजुली सरकार के पक्ष में है। पत्र फिर कहता है कि सरकार के गठन में देरी क्यों। देश कई सवालों से जूझ रहा है। आतंकवाद, मुद्रास्फीति, गरीबी, बिजली-पानी, देख-रेख और कानूनी उथल-पुथल इत्यादि। अब जीती हुई दोनों पार्टियों और उनके साथियों को इन सवालों पर काम करना चाहिए। सीधी टक्कर ठीक नहीं। मुशर्रफ को भी चाहिए कि वह असेम्बली द्वारा पारित फैसलों को मानें, जिसमें उनकी (मुशर्रफ की) ताकत का सवाल भी शामिल है। संविधान को जनता के ख्याल के मुताबिक ढाले और अपनी मनमानी बंद करे। अब देखिए यह लोग क्या करते हैं। धार्मिक पार्टियां भी मुशर्रफ के खिलाफ हैं। जमायते इस्लामी ने सरकार का साथ देने के लिए कई शर्ते रखी हैं, जिसमें मुर्शरफ को निकालना, लाल मस्जिद में लड़कियों का मदरसा जामिया हफसा की इमारत जो मस्जिद में फौज ने गिरा दी थी, उसी जगह बनाने की फरमाईश, डॉक्टर अब्दुल कादिर को अमेरिका या किसी और देश को न सौंपना और उन्हें सम्मान देना शामिल हैं। कई तरंगें चल रही हैं परंतु कुर्सी और धन सब ठीक कर लेते हैं। इधर वकीलों के आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहे। इस्लामाबाद, लाहौर, रावलपिंडी, पेशावर, सिंध में अनशन हो रहे हैं। एक अनशन शिविर को संबोधित करते हुए पूर्व सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन अध्यक्ष एतजाज हुसैन (जो अपने घर में नजरबंद हैं) कहा कि सरकार एक आम आर्डर से जजों को बहाल कर सकती है। कानून के हिसाब से उन्हें दो तिहाई मत नहीं चाहिए।ं

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