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आम आदमी पर नहीं तेल का बोझ

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल का बोझ सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) पर पड़ रहा है, फिलहाल देश की आम जनता को इसकी कई कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी। पेट्रोलियम मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों के प्रति बैरल 105 डालर, 106 डालर या इससे भी अधिक हो जाने के बावजूद इसका बोझ देश के आम उपभोक्ताओं पर डाले जाने की सरकार की योजना नहीं है। इसका बोझ सार्वजनिक क्षेत्र की खुदरा विपणन करने वाली कंपनियां ओएमसी) ही वहन करेंगी। अगर कोई असाधारण घटना नहीं होती है तो सरकार ने लगभग अगले साल तक के लिए पेट्रो उत्पादों की कीमत तय कर दी है जिसे बढ़ाया नहीं जाएगा। जाहिर है कच्चे तेल की कीमतों के आसमान छूने की वजह से देश की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को वह लाभ भी हासिल नहीं हो सकेगा जो उन्होंने लाख चिरौरियों के बाद सरकार से पेट्रोल में दो रुपये प्रति लीटर तथा डीजल में एक रुपया प्रति लीटर की मामूली वृद्धि के रूप में पाया था। इससे उन्हें साल में लगभग 840 करोड़ रुपये का फायदा होता जबकि उनके ऊपर अंडररिकवरी (लागत से कम कीमत पर पेट्रो उत्पादों को बेचने पर होने वाला नुकसान) का बोझ 71,808 करोड़ रुपये का है। जाहिर है, आगे आने वाले दिन चुनावी दिन होंगे। आम चुनावों के इसी वर्ष होने की आशंका लगातार गहराती जा रही है। अगर इस साल आम चुनाव न भी हुए तो अगले वर्ष की पहली छमाही में यह निर्धारित है ही। इस साल वैसे भी कई राज्यों के विधान सभा के चुनाव होने अभी शेष हैं। इसलिए सरकार इस सबसे संवेदनशील मुद्दे को छेड़कर फिर से पेट्रो उत्पादों की कीमत में इजाफा करने का जोखिम नहीं मोल लेगी। एक वजह और भी है। आम बजट 2008-0में किसानों को 60 हजार करोड़ रुपये की कर्जमाफी तथा सामाजिक क्षेत्रों के लिए भारी व्यय के प्रावधान के बाद सरकार, खास कर वित्त मंत्रालय, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण प्राप्त हो रहे तेल शुल्कों के लाभ से वंचित नहीं होना चाहेगी। उल्लेखनीय है कि 2003-04 में सरकार को तेल शुल्कों से जहां 6रोड़ रुपये हासिल हुए थे, वहीं 2006-07 में यह रकम काफी अधिक बढ़ गई। सूत्रों के अनुसार, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अगर कच्चे तेल की कीमतों में इसी कदम तेजी बनी रही तो सरकार को तेल शुल्कों के मार्फत होने वाले कर संग्रह में और वृद्धि ही होगी। इसलिए वित्त मंत्रालय के लिए भी फिलहाल चिंता की कोई बात नहीं है। जहां तक वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई उछाल का सवाल है तो इसके मूल में अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आई मंदी की आशंका ही बड़ी वजह है। इसी वजह से तेल निर्यातकारी 13 देशों का कार्टल (ओपेक) भी तेल उत्पादन बढ़ाने में आनाकानी कर रहा है। इसके अलावा, हालिया दिनों में मध्य पूर्व क्षेत्र के सियासी माहौल में अराजकता छाई है जिसका प्रभाव ओपेक की राजनीति पर पड़ रहा है। कच्चे तेल की वैश्विक मांग में भी इन दिनों सुस्ती का आलम है।

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