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संविधान सभा एजेंडे पर माआेवादी भी खुश नहीं

नेपाल को फेडरल रिपब्लिक बनाने के लिए 10 अप्रैल को नई संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव होगा। फेडरल रिपब्लिक की धारणा पर प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच व्यापक सहमति के बावजूद चुनाव में राजशाही के खुले और छुपे समर्थक अपने-अपने ढंग से सक्रि य हैं। इनमें सिर्फ दक्षिणपंथी या मध्यमार्गी ही नहीं, कुछ वामदलों के नेता भी शामिल हैं। देश में फिलहाल दो ही ऐसी ताकतें हैं, जिन्हें अपने-अपने मकसद को लेकर कोई कन्फ्यूजन नहीं है। ये हैं-राजा और माओवादी। राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक पार्टी के दोनों धड़े किसी न किसी रूप में राजशाही को बनाए रखने की वकालत कर रहे हैं। देश की सबसे बड़ी पार्टी-नेपाली कांग्रेस में कई प्रमुख नेता दबे-छुपे ढंग से राजशाही के पक्ष में दलीलें देते हैं। चुनावी माहौल और अवाम का दबाव देखकर फौरन वे अपना बयान भी बदल लेते हैं कि वे लोकतंत्र तो चाहते हैं पर नेपाल की अपनी शैली का लोकतंत्र।़ मधेशी मोर्चे ताकतवर तो हैं पर वे भारी कन्फ्यूजन के शिकार नजर आ रहे हैं। कोइराला सरकार के साथ हुए ताजा समझौते के बावजूद स्वायत्त मधेश प्रांत की धारणा पर इनके विभिन्न घटकों में भी सहमति नहीं बनी है। महंत ठाकुर और उपेंद्र यादव के अलग-अलग मोर्चे के अलावा भी मधेश में कई गुट सक्रिय हैं, जो अलग-अलग सुर अलाप रहे हैं। कई राजनैतिक गुटों और जातीय समूहों (एथनिक ग्रुप्स) को यह बात समझ में नहीं आ रही है कि इतने विशाल क्षेत्र को महज एक प्रांत में कैसे बांधा जाएगा।़ नेपाल के तराई क्षेत्र में प्रत्यक्ष निर्वाचन के तहत संविधान सभा की 114 और शेष नेपाल में 126 सीटें बनाई गई हैं। राजा ज्ञानेंद्र, उनके निकटस्थ समर्थक और रणनीतिकार फिलहाल लोकतंत्रवादी ताकतों के बीच कन्फ्यूजन बढ़ाने के एजेंडे पर जुटे हैं। उन्हें मालूम है कि सिर्फ इसी ढंग से वे राजशाही के संपूर्ण खात्मे से बच सकते हैं और ‘प्रतीकात्मक राजतंत्र’ के नाम पर राजा और राजमहल रह सकते हैं। इसी तरह नेकपा (माओवादी) भी राजशाही के संपूर्ण खात्मे और फेडरल रिपब्लिक न्यू नेपाल के संवैधानिक गठन के एजेंडे को लेकर जुटे हैं। सिर्फ नेपाली कांग्रेस की सुजाता कोइराला, आरपीपी-एन के कमल थापा, दूसरे गुट के पशुपति शमशेर राणा आदि ही नहीं, देश की बड़ी वामपंथी पार्टी-एमाले तक में सीमित राजशाही या प्रतीकात्मक राजतंत्र के खुले या छुपे पैरोकार मौजूद हैं।

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