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विकास में आधी आबादी को भी होना होगा साझीदार

आधी आबादी को भी राज्य के विकास में साझीदार होना होगा। उन्हें भी राजनीतिक व आर्थिक समझ विकसित कर राज्य को उस श्रेणी में लाने का प्रयास करना होगा जहां से कोई काम खोजने नहीं काम मांगने आए। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मानव संसाधन विकास विभाग द्वारा आयोजित ‘उमंग’ कार्यक्रम का उद्घाटन करने के बाद कहा कि आज जरूरत बिहारी भावना को जागृत करने की है। उन्होंने कहा कि आज तो जो विकास की बात नहीं करते थे वह भी विकास की बात करने लगे हैं जो खुशी की बात है।ड्ढr ड्ढr मुख्यमंत्री ने कहा कि बाहर में बिहारियों पर काफी अत्याचार किए जा रहे हैं और उस पर रोक के लिए हमने प्रधानमंत्री से पहल की मांग की है। उन्होंने कहा कि बालिकाआें की शिक्षा के लिए प्राथमिक स्तर पर पोषाहार, मिडिल स्कूल स्तर तक पोशाक व उच्च विद्यालय में प्रवेश के साथ ही साइकिल देने की योजना पर कार्य चल रहा है। इसके अलावा सरकार ने बालिकाआें को आत्मरक्षा के लिए जूडो-कराटे की ट्रेनिंग दिलाने का भी निर्णय ली है। उन्होंने कहा कि मौलाना आजाद की जयंती को शिक्षा दिवस के रूप में मनाने का फैसला लिया है। पिछली बार की तुलना इस बार यह कार्यक्रम वृहत रूप से चलाया जाएगा। उन्होंने कहा कि पिछड़ों, अपि पिछड़ों, महादलित, अल्पसंख्यक महिला व पुरुष दोनों में समान रूप से विकास की गति को बढ़ाना होगा। इस मौके पर शिक्षा मंत्री वृशिण पटेल ने कहा कि लोकसभा व विधानसभा में भी महिलाआें को शीघ्र ही आरक्षण का लाभ मिलेगा और इसके लिए सबको मिलकर काम करने की जरूरत है।ड्ढr ड्ढr इस मौके पर कल्याण मंत्री रामेश्वर पासवान, पंचायतीराज मंत्री नरेंद्र नारायण यादव, महाधिवक्ता पीके शाही, समाज कल्याण विभाग के प्रधान सचिव विजय प्रकाश समेत कई विधायक व विधान पार्षद उपस्थित थे। अतिथियों का स्वागत मानव संसाधन विकास सचिव अंजनी कुमार सिंह ने और धन्यवाद ज्ञापन बिहार शिक्षा परियोजना के परियोजना निदेशक राजेश भूषण ने किया।ड्ढr ड्ढr एक तरफ ‘उमंग’ तो दूसरी तरफ रोटी की जंगड्ढr पटना (आशीष कुमार मिश्र) । एक तरफ ‘उमंग’ तो दूसरी तरफ रोटी की जंग। कुछ ऐसा ही दृश्य राजधानी में शनिवार को अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर दिखा। गांधी मैदान में लाखों रुपए खर्च कर जहां राज्यभर की महिलाओं व बच्चियों के लिए सरकार ने उत्सव का आयोजन किया, वहीं उससे चंद कदम के फासले पर एक महिला सादमति अपनी 12 और 7 साल की बेटियों के साथ दिनभर रोटी की जंग लड़ती रही। हालांकि सादमति इस लड़ाई में अकेली नहीं है। उसके जैसी हजारों लाखों महिलाएं प्रदेश में हैं जो ‘महिला दिवस’ पर भी खेतों में, खलिहानों में, चिमनियों में, कारखानों में खुद व अपनी नवजातों के साथ दिनभर खटती रही। उनके लिए आम दिनों की तरह शनिवार का दिन भी गुजर गया।ड्ढr ड्ढr रीजेन्ट सिनेमा के सामने गांधी मैदान में दिनभर ढोल पीटती सादमति हांक लगाती है-‘साहब, बच्चे के गले में फांसी का फंदा लगाया-किसके लिए-पापी पेट के लिए। है कोई समझदार जो इन बच्चियों को दे दे दो-एक रुपए’। मां की आवाज से उत्साहित होकर बेटियां आरती (12) व रजनी (7) दुस्साहसी करतब दिखाती है। भीड़ में खड़े लोग दांतों तले उंगलियां दबाए रहे। चार लाठियों के सहारे बंधी लम्बी रस्सी पर हाथ में डंडा लेकर बैलेंस बनाकर इस पार से उस पार होती रजनी की कला देख तालियां तो खूब बजीं पर बख्शीस देने के सवाल पर लोगों के हाथ पॉकेट तक नहीं गये। फिर भी इस परिवार का उत्साह बरकरार रहा। कुछ अंतराल पर चार बार इन्होंने अपना खेल दिखाया। ढोल बजाकर सादमति लोगों की भीड़ जुटाती।ड्ढr ड्ढr उसका गूंगा पति करतब दिखाने में बच्चियों की गुरु की भूमिका में होता। छोटा बेटा कालीचरण (6 साल) जोकर बनकर लोगों को लुभाता। आरती रस्सी पर चल रही होती जबकि उसके थकने पर छोटी बहन रजनी उसका स्थान ले लेती। थाली में ठेहुना रोपकर करीब दस फीट लम्बी रस्सी को इस पार से उस पार लांघ देने सबसे जोखिमभरा खेल था। लेकिन बच्चे निपुण थे। सादमति ने कहा कि डेढ़ ढाल की उम्र से ही तीनों को ट्रेनिंग दी गई। तीन बच्चे और पति-पत्नी दिनभर में चार खेला दिखाते हैं तब जाकर किसी तरह ढाई-तीन सौ रुपए जमा होते हैं। खगौल में तम्बू गाड़कर रहता है यह परिवार। बहरहाल सादमति और उनका कुनबा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को ‘मुंह चिढ़ाने’ के लिए एक सटीक उदाहरण है।

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