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अच्छे बजट के गुण

हमने बचपन से अपने घर में बजट का खौफ देखा है। माता जी, बजटीय कहर से बचने, आटा, दाल, चावल की थोक खरीद में जुटतीं कि दो तीन महीनों का स्टाक तो हो ही जाए। उनकी विवशता थी कि घर में चारपाई, बिस्तर, कुर्सी, मेज वगैरह, बेवजह जगह घेरे थे, वर्ना वह घर को गोदाम बना डालतीं। कम से कम अगले साल तक की मूल्यवृद्धि से जूझ लें। पिताजी के कमरे में, सिगरेट के तीन-चार ‘कार्टन’ नार आते। इस जहरीली कागजी नली की कीमत तो बढ़नी ही बढ़नी है। इन शिक्षाप्रद दृश्यों से अपने पल्ले पड़ा कि बजट का सबसे बड़ा गुण कीमतों में वृद्धि है। इसी के मुसल्सल असर से आलू-प्याज जैसी समाजवादी सब्जियां पूंजीवादी हो गई हैं। कोई मेहमान जबर्दस्ती आ टपके, तो उसे दिखाने को घर में प्याज आ जाते हैं। अकसर रसे में डुबकी लगाने की नौबत है, आलू के एकाध कण की तलाश में। गर्म पानी में, अगर रंग दिखे दाल का तो, इससे दिलकश और कोई नाारा नहीं है अपने लिए। बजट की एक आेर पहचान इसका किसी खुफिया साजिश की तरह, बनाए जाना है। सबको पता है कि यह हमला किस दिन होना है। पर कोई नहीं जानता कि किस मोर्चे पर होगा। कर बढ़ेगा कि सरचार्ज। वार सीधा होगा या पीठ पीछे, यानी टैक्स ‘डायरेक्ट’ होगा कि ‘इनडायरेक्ट।’ षड्यंत्र को जनहित का नाम देना, बजट की एक और खासियत है। लगता है कि मुल्क की सुरक्षा से बड़ी और जरूरी, बजट प्रस्तावों की रक्षा है। राष्ट्रीय सुरक्षा के कागजात तो लीक होते रहते हैं, बजट के नहीं। जो अधिकारी कर्मचारी ‘लीक’ के धंधे में पारंगत है, वह भी बजट को बख्श देते हैं। इससे बजट की अहमियत जाहिर है। राष्ट्र रहे न रहे, बजट तो रहना ही रहना है। सरकार, अपनों की हो या परायों की, फर्क क्या पड़ता है? पैसे की दरकार तो सबको होती ही होती है। धन तो सब को उगाहना है। जहां बजट है, वहां गोपनीयता है। जहां गोपनीयता है, वहां अपवाद है। जहां अपवाद है, वहां प्रभाव है। जहां प्रभाव है, वहां पैसा है। तभी तो आयात-निर्यात के बदलाव का ढांचा पहले से जान लेते हैं, असरदार उद्योगपति। इसके लिए लाखों के खर्चे से उन्हें परहेज नहीं है। पहले जानकारी मिली तो करोड़ों कमा भी तो लेंगे। अच्छे बजट का एक और अहम लक्षण है। इसका शिकार तक खुश होकर ताली बजाता है। उसे आभास तक नहीं होता कि वित्तमंत्री ने उस पर निशाना साधा है। तभी तो सर्विस टैक्स की घोषणा के बाद, हम घटती आयकर-दर में मगन थे। हम कहां जानते थे कि दस-बारह प्रतिशत टैक्स बैठे-ठाले बढ़ गया। कहने को सेवा-कर है और सेवा ही गायब है! हमें डर है। ऐसे ही चतुर वित्तमंत्री आते रहे तो कहीं धूप-हवा को भी सर्विस टैक्स के दायरे में न ले आएं!

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