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श्रीमहादेव शम्भो!

सृष्टि के मिथक में मान्य त्रिदेव हैं-सृष्टि रचयिता ब्रह्मा, सृष्टिपालक विष्णु और सृष्टि संहर्ता शिव। इन तीनों में महादेव होने का सवर्ोच्च विशेषण शिव को दिया गया हेै। इन्हीं महादेव की प्रार्थना में निम्न श्लोक स्मरणीय होना चाहिए- ‘कर-चर कृतं वा कायजं कर्मजं वा, श्रवण-नयनजं वा मानसं वापराधम्। विहितमविहितं वा सर्व मे तत्क्षमस्व, जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो!’ प्रार्थी कहता है कि मेरे हाथों से, मेरे पांवों से अथवा सारे शरीर के द्वारा और मेरे कर्म से या कानों द्वारा गलत सुनने का तथा आंखों से गलत-बुरा देखने का, यहां तक कि मन की सोच व कल्पना से भी कोई अपराध जाने-अजाने हुआ हो तो उन्हें क्षमा किया जाए। हे महादेव शंभु, हे करुणा के सिंधु, आपकी सदा जय हो! हालांकि इस तीसरे देवता का दायित्व अवांछित लगता है कि सृष्टि के संहार का प्रलय काल ला देना, फिर भी दुष्ट समुदाय के विनाश वास्ते हम उन्हें प्रलयंकर नाम-स्मरण से भी गुरेज नहीं करते। शिव के अन्य कर्मानुरूप विविध नामों का उल्लेख हमारे पौराणिक साहित्य में जो मिलता है वह उनके खास कारनामों के अनुरूप है। प्रलयंकर के बावजूद वह शिव हैं, शंकर हैं, शंभु हैं- इनकी व्याख्या में वह कल्याणकारी, शांति स्थापित करने वाले और भोले भंडारी हैं। इसी भोलेपन के कारण जल्दी प्रसन्न होकर पात्र-कुपात्र और उचितानुचित की परवाह न करते हुए वर दे देने वाले यह आशुतोष नाम से भी जाने जाते हैं। लंकापति रावण के यह कुलदेवता हुए जो इनके ध्वनिप्रधान सांगीतिक तांडव स्तोत्र पर नाच उठे थे। भस्मासुर के घोर तप के कारण उस पर इतने कृपालु हो गए कि उसे वर देकर उसी से जान बचाने को भाग खड़े हुए महादेव जी। स्वर्ग से गंगावतरण के तीव्र प्रवाह को अपनी जटाआें में झेल लेनेवाले यह गंगाधर भी कहलाते हैं। विष्णु की माया से प्रकट मोहिनी रूप पर मुग्ध-स्खलित हो जाने वाले महादेव कामदेव को अपने तीसरे नेत्र की क्रोधाग्नि से भस्म करके कामजित व स्मरारि बने। सागर मंथन से उबल उठे विनाशकारी विष को अपने कंठ में ठहरा कर नीलकंठ व मृत्युंजय बने। हिमाचल की पुत्री पार्वती उमा से ब्याहने वृषभासन पर बैठकर गए फिर भी कभी दिगंबर तो कभी बाघाम्बर-धारी कापालिक तथा श्मशानवासी औघड़ ही बने रहे। ससुराल के करीब एक घर उनका कैलास (श) पर्वत भी है, जिस कारण शिव कैलाशपति नाम से संबोधित होते हैं। जटाजूट पर चंद्रकला आभूषण-सी सुशोभित है तो शिव चंद्रचूड़, चंदेशेखर, चंद्रमणि और शशिधर कहलाए।ड्ढr संस्कृत कवियों ने रीतिग्रंथों के लक्षणों के अनुसार सार्थक पद प्रयोग किए हैं जो विलक्षण हैं। शिव आराधना में एक चमत्कारी प्रयोग निम्न छंद में चकित करता है-ड्ढr ‘विनाक-फणि-बालेन्दु-भस्म-मंदाकिनी युता।ड्ढr पवर्ग-रचिता मूर्ति:, अपवर्गप्रदासतु व:॥’ नागरी वर्णमाला के पांचवें वर्ग प वर्ग के क्रमाक्षरों का सहारा लेकर पांच पदों का शिव-स्तुति में सुंदर समीचीन प्रयोग किया है। प-पिनाक (धनुष) म-मंदाकिनी (गंगा)- इस प वर्ग से (प से म तक के पांच वगरे से) बने पदाथरे से सुशोभित शिवमूर्ति आप सभी को अपवर्ग (प वर्ग का विलोम-सा लगता स्वर्ग) का सुख प्रदान करे।ं

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  • Web Title: श्रीमहादेव शम्भो!