अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

न्यूनतम 25 प्रतिशत सार्वजनिक शेयर का फरमान गडबड़ : उद्योग जगत

उद्योग जगत ने कंपनियों पर शेयर बाजार में बने रहने के लिए कम से कम 25 प्रतिशत शेयर जनता के बीच रखने के वित्त मंत्रालय के फरमान में तमाम गडबड़ियां गिनाते हुए कहा है कि इस प्रावधान को लचीला रखने और इसमें बाजार नियामक के फैसले का अधिकार कायम रखने कीोरूरत है। वित्त मंत्रालय का मानना है कि बाजार में शेयर यादा होंगे तो उनकी कीमत के साथ खिलवाड़ कम होगा। उद्योग मंडल एसोचैम ने सूचीबद्धता के लिए दस प्रतिशत सार्वजनिक शेयर की न्यूनतम सीमा को एक झटके में ही बढा कर 25 प्रतिशत करने के प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा है कि यह सीमा चरणबद्ध तरीके से पांच वर्ष में की जानी चाहिए। एसोचैम के अध्यक्ष वीएन धूत ने कहा है कि प्रतिभूति अनुबंध अधिनियम 1में संशोधन कर इस निर्णय को तीन महीने में लागू करने का प्रस्ताव अव्यावहारिक है। उद्योग मंडल फिक्की ने अपनी सदस्य कंपनियों से मिली राय के आधार पर जारी एक विस्तृत टिप्पणी में कहा है कि बाजार में सूचीबद्धता के लिए न्यूनत सार्वजनिक शेयर की शर्त के लिए भारतीय डिपाजिटरी रिसीट के बारे में 2004 में जारी नियमों को ही मानक बनाया जाए अन्यथा भारतीय कंपनियों घाटे में रहेंगी। विदेशी कंपनियों को भारत में डिपोजिटरी शेयर जारी कर पूंजी जुटाने की अनुमति देने के उद्येश्य से यह नियम बनाया गया है। उल्लेखनीय है कि वित्त मंत्रालय ने शेयर बाजार में सूचीबद्धता के लिए न्यूनतम 25 प्रतिशत शेयर सार्वजनिक रूप से जारी करने की शर्त लगाने और इस मामले में सेबी का विवेकाधीन अधिकार खत्म करने का प्रस्ताव किया है। अभी यह दस प्रतिशत तक है। फिक्की का कहना है कि ब्रिटेन, अमेरिका और सिंगापुर की तरह भारत में भी विदेशी संस्थागत निवेशक, म्यूचुअल फंड और वित्तीय संस्थानों को बेचे गए शेयरों को भी सार्वजनिक शेयर की परिभाषा में लाया जाए। इसका दुरूपयोग रोकने के लिए 1े प्रतिभूति अनुबंध कानून में ऐसे निवेशकों के शेयरों का सार्वजनिक शेयर में हिस्सा निर्धारित करने का बाजार विनियामक को अधिकार दिया जाए।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: न्यूनतम 25 प्रतिशत सार्वजनिक शेयर का फरमान गडबड़ : उद्योग जगत