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चुनाव की धमक से नक्सली संगठन सतर्क

नेपाल में माआेवादियों के चुनावों में भाग लेने की तैयारी से बिहार में नक्सली संगठन सावधान हैं। अभी संगठन के वैसे नेताआें की स्कैनिंग चल रही है जो चुनावों में भागीदारी की वकालत कर सकते हैं। देश में लोकसभा चुनाव की धमक होते ही बिहार में भाकपा माआेवादी जैसे नक्सली संगठन विशेष एहतियात बरत रहे हैं। संगठन के एक नेता ने स्वीकार किया कि चुनाव में भागीदारी का तर्क देने वाले लोग तो हमेशा से संगठन में एक अलग धारा के रूप में रहे हैं। ये लोग चुनाव के रणनीतिक इस्तेमाल का तर्क देते हैं। इनमें विचारधारा के स्तर पर कमजोर लोगों की बात जब संगठन में नहीं चलती तो वे खुद चुनाव में उतर जाते हैं।ड्ढr ड्ढr हालांकि यह संयोग ही है कि बिहार में अब तक इनका कोई नेता चुनाव जीतकर विधानसभा नहीं पहुंचा है। चुनाव जीतने वालों में वही नक्सली नेता शामिल रहे हैं जिनके संगठन ने ही चुनाव का रास्ता अख्तियार किया है। उमाधर सिंह को राज्य का पहला नक्सली विधायक माना जाता है और वे अपने संगठन के फैसले के तहत चुनाव में उतरे थे। ऐसे कई पुराने नक्सली नेता तो बाद में चुनाव लड़कर मंत्री तक बने। कमल पासवान संसदीय राजनीति में आने के पहले नक्सली नेता थे। वे मंत्री के अलावा जनता दल और राजद के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। पिछली सरकार में प्राथमिक शिक्षा राज्य मंत्री रहे वीरेन्द्र प्रसाद भी नक्सली नेता रह चुके थे और कई बार पुलिस से उनकी भिड़ंत भी हो चुकी थी। एक बार तो वे पुलिस की गोली से घायल भी हुए थे। अभी राजनीतिक बंदी कल्याण मोर्चा चला रहे पूर्व विधायक रामाधार सिंह भी कभी नक्सली आन्दोलन के समर्थक माने जाते थे। संगठन से दूर होकर वे चुनाव लड़े और विधायक बन गए। हारने के बाद मोर्चा बनाया और यह मोर्चा जेल में बंद माआेवादी समेत अन्य राजनीतिक बंदियों के अधिकार की लड़ाई लड़ रहा है। यह अद्भुत विरोधाभास है कि ये संगठन पांच वषरे तक चुनाव के बहिष्कार की आवाज लगाते रहते हैं लेकिन चुनाव आते ही इनके किसी न किसी नेता को चुनाव का मोह खींच ही लेता है। इतनी ‘पढ़ाई-लिखाई’ के बावजूद पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी नेता कामेश्वर बैठा पलामू से चुनाव लड़ गए थे और बहुत मामूली अंतर से पराजित हुए थे। पंचायत चुनाव में भी कई नक्सली नेताआें ने मैदान में जोर आजमाइश की थी लेकिन अधिसंख्य को वापस ही लौटना पड़ा।ं

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