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कांग्रेस को महंगी पड़ सकती है यह चुप्पी

नासिक, पुणे, मुंबई, ठाणे आदि क्षेत्रों से उत्तर भारतीयों का पलायन जारी है। अब सवाल फिलहाल यह नहीं है कि उनके जाने से कितनी फैक्िट्रयों में उत्पादन कम होगा, टाटा मोटर्स, फिएट, जनरल मोटर्स, वाक्स वैगन और बजाज को मजदूरों की कमी का सामना करना पड़ जाएगा, सेब-अंगूर-प्याज की खेती कितनी मारी जाएगी, बिल्डिंग बनने का काम किस हद तक रुक जाएगा, सड़कों पर टैक्िसयां कम हो जाएंगी तथा हाउसिंग सोसायटियों में वाचमैन के टोटे पड़ जाएंगे। सवाल यह है कि क्या उत्तर भारतीयों के पलायन से मुंबई आर्थिक राजधानी बनी रह पाएगी या महाराष्ट्र विकसित राज्यों में शामिल रह पाएगा? महाराष्ट्र नव निर्माण सेना ने इसकी कुछ भरपाई के लिए मराठी नौजवानों को दूध, सब्जी, अखबार बांटने, चाट-पकौड़े बेचने की ट्रेनिंग देना शुरू कर दिया है। कोली समुदाय के अलावा बाकी लोगों से भी कहा जा रहा है कि वे भी मछली के धंधे में लगें। यह एक अच्छी पहल है। पढ़े-लिखे मराठी जनों ने यह सवाल भी उछाल दिया है कि उनके लिए अच्छे जॉब क्यों नहीं ढूंढे जा रहे हैं, ‘लेबर क्लास’ में उन्हें क्यों डाला जा रहा है। यह रवैया ‘गरीब रथ’ की तरह है जो गरीब को एसी में बैठने का सुख कम, गरीब होने का एहसास ज्यादा दिलाता है। उत्तर भारतीयों ने मुंबई तथा महाराष्ट्र में रोजगार के अवसर किसी से झपटे नहीं हैं, उल्टे उन्होंने ‘लेबर’ की मांग की पूर्ति की है। अगर श्रम की पूर्ति महाराष्ट्र से ही हो जाती, तो बाहरी लोगों को आने कौन देता। कभी वह भी एक जमाना था, जब मुंबई में कपड़ा मिलों में काम करने के लिए मिल मालिक तरह-तरह का लोभ देते थे। अब वही मजदूर भगाए जा रहे हैं, उनके घर जलाए जा रहे हैं। ‘कल’ कुछ और न हो जाए, यह सोचकर वे खुद भी बोरिया-बिस्तर बांध रहे हैं। प्रशासन का हास्यास्पद बयान यह आया कि मजदूर होली की छुट्टी पर घर जा रहे हैं, उसके बाद वे लौट जाएंगे। वे लौट सकते हैं बशर्ते जान-माल की गारंटी मिले। महाराष्ट्र से उत्तर भारतीयों के भगाए जाने की रणनीति समाज को बांटने की सायास कोशिश, प्रशासन की अकर्मण्यता-भारतीय संविधान और कानून-व्यवस्था के ढांचे को कितना कमजोर करेगी- यह चिंता अपनी जगह है। मगर फौरी चिंता यह है कि इससे कांग्रेस को कितना नुकसान होगा! नवम्बर में होने वाले कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों और फिर लोकसभा चुनाव में इन श्रमिकों की भूमिका क्या होगी? मुंबई की गूंज कितनी दूर तक जाएगी? ऊपरी तौर पर लगता है कि ये श्रमिक क्या कर लेंगे! लेकिन अंदरूनी तथ्य मोबाइल फोन कंपनियां तथा टेलीफोन बूथ ही बता सकते हैं कि राज ठाकरे की सेना के आपरेशन के दौरान रोज कितने लाख फोन अचानक उत्तर भारत से आए और गए। दोनों तरफ की आवाजों में हड़बड़ी थी, मुंबई और महाराष्ट्र छोड़ने की कसमें थीं। दोनों तरफ क्षोभ और गुस्सा था। गुस्सा था राज ठाकरे की करतूतों और शिवसेना के उकसाने वाले बयान के खिलाफ। क्षोभ था सरकार के विरुद्ध, जो और भी ज्यादा हो गया है। लालू, नीतीश, मायावती, जार्ज फर्नाडीज, प्रभुनाथ सिंह सरीखे नेताआें ने तो बोल कर एहसास करा दिया कि वे उनके साथ हैं, पर कांग्रेस ने विलासराव देशमुख पर दबाव नहीं डाला। कांग्रेसी मान बैठे हैं कि राज ठाकरे की मुहिम से कांग्रेस को ही फायदा होगा। नुकसान शिवसेना (गठबंधन) को होगा। शिवसेना के वोट बैंक को राज ठाकरे तोड़ रहे हैं। राज को शिवसेना से निपटने देते हैं। राज से कांग्रेस बाद में निपट लेगी। कांग्रेस के नेताआें का यह एटीटय़ूड वही है, जो कभी बाल ठाकरे के मामले में था। फिलहाल कांग्रेस केन्द्रीय बजट के नशे में है। किसानों की कर्ज माफी, टैक्स में बदलाव, लोक लुभावन वायदे को वह अगला चुनाव जीतने का हथियार मान रही है। पवार की पूरी कोशिश है कि महाराष्ट्र में अगला चुनाव अपने दम पर लड़ें, राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बनने का उनका कोई सपना नहीं है। कांग्रेसियों को शायद यह भान भी नहीं कि राज और फिर शिवसेना के अभियान का मैसेज हर जगह गलत गया है। खासकर उत्तर प्रदेश-बिहार में, जहां ढहे हुए गढ़ कांग्रेस संवारना चाहती है। देश की सत्ता का फैसला वहीं से होता है। क्या वे इस सवाल का जवाब दे पाएंगे कि जब महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर हमले हो रहे थे, तो वे उनके घाव पर मरहम लगाने क्यों नहीं गए? या देशमुख सरकार से जवाब-तलबी क्यों नहीं की? केन्द्रीय गृहमंत्री महाराष्ट्र के हैं, उन्होंने ‘बोल वचन’ के अलावा क्या किया? जो किया, कोर्ट ने ही। लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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