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शाश्वत सत्य

राजा भर्तृहरि ने भय के विषय में कहा है। जब मनुष्य की आनन्द की स्थिति होती है, तो उसे किसी रोग का भय सताने लगता है। समाज में गौरवपूर्ण स्थिति हो तो उससे नीचे गिरने का भय रहता है, धन-संपन्नता हो तो किसी विपरीत स्थिति का भय पैदा हो जाता है। प्रभुत्व की स्थिति में है तो किसी शत्रु का डर, सुन्दरता हो तो बुढ़ापे का भय, धर्म ग्रंथ सम्मत पाण्डित्य है तो किसी प्रतिद्वंद्वी विरोध का डर, सद्गुण हों तो कलंकित करने वाले का भय, शरीर है तो मृत्यु का भय है।ड्ढr यद्यपि यह एक शाश्वत सत्य है फिर भी मृत्यु से सब को भय लगता है। वास्तव में भय किसी वस्तु से अलग हो जाने का है। जो छूटता है उसमें भय है। धन छूट जाने का भय, परिवार छूट जाएगा, इसका भय है। भय त्याग में है। किस त्याग में भय है? जिन वस्तुआें को या परिजनों को हम उपयोगी समझते हैं, उनके त्याग में भय है। वहां भय नहीं होता, जहां त्याग अपनी इच्छा से किया जाए। जैसे कपड़ा पुराना हो जाता है तो इच्छा से त्याग करते हैं। ऐसे त्याग में संतोष है। दुख वहां होता है, जहां कोई अपनी वस्तु छिन या छूट जाती है। हम कपड़ा या धन दूसरों को दे सकते हैं, परंतु एक वस्तु है ‘प्राण’ जो हम नहीं दे सकते। शरीर से ‘प्राण’ निकल जाए तो कहते हैं मृत्यु हो गई। इसमें दुख होता है, क्योंकि प्राण को इच्छा से नहीं छोड़ते। पंचभूतों से बना यह शरीर पहले विकास को प्राप्त होता है और फिर ह्रास की आेर उन्मुख होता है। पंचभूतों के साथ आत्मा का जुड़ जाना- जन्म है। पंच महाभूतों से आत्मा का अलग हो जाना- मृत्यु है। हमारे मनीषी बताते हैं कि जो लोग मृत्यु से निर्भय होकर जीवन को पूर्णतया और अर्थपूर्ण जीते हैं, वे ही अपना जीवन विश्वास से जी पाते हैं। परन्तु हममें से अधिकतर जीवन के परिवर्तन और उलट-फेर में इतने तटस्थ और उदासीन रहते हैं कि मृत्यु के बारे में अज्ञानी से बने रहते हैं। मृत्यु अपने शिकार पर बाज पक्षी की तरह चुपचाप आक्रमण कर देती है। गुरु तेग बहादुर जी चेतावनी देते हैं ‘प्रिय मित्र, मृत्यु स्वच्छन्द है, वह कभी भी अपने शिकार के भक्षण के लिए झपट सकती है। वह चुपचाप ही आक्रमण कर देगी।’ जब तक भय को वशीभूत नहीं करेंगे, तब तक हम कुछ भी सकारात्मक नहीं पर पाएंगे। हमारे कर्म तुच्छ बने रहेंगे। इन भय से छूटने का एक ही उपाय है ईश्वर के चरणों में शरण। हम अज्ञानवश जीवन के ऊंचे उद्देश्य को भूलने के साथ मृत्यु के सत्य को भी भूल जाते हैं। ईश्वर स्मरण से ही उसके पास जाने के द्वार खुलेंगे, लेकिन ऐसा करने से पहले हमें सत्य के मार्ग पर चलकर अभिमान छोड़ना होगा और सहनशीलता और विनय के साथ एक कुलीन जीवन के लिए प्रयत्न करना होगा। यजुर्वेद (1310) का मंत्र ‘त्र्म्बकं यजामहे’ कहता है कि हम तीनों कालों में रक्षक, सुगंधित अर्थात यशस्वी, पुष्टिवर्धनम् अर्थात शारीरिक और सामाजिक बल के बढ़ाने वाले जगदीश की स्तुति करते हैं। हे प्रभो, जैसे पका हुआ खरबूजा लता-बन्धन से छूट जाता है, वैसे ही हम मृत्यु से छूट जाएं, परंतु मोक्षरूपी अमृत से न छूटें। यदि यह अवस्था मनुष्य को प्राप्त हो जाए तो यही मृत्यु पर विजय है।

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