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समान हो शिक्षा सत्र की तारीख

पिछले कई वषरे से दिल्ली में चल रहे विभिन्न विद्यालयों में शिक्षा-सत्र में एकरूपता का अभाव है। जहां दिल्ली सरकार के विद्यालयों व केन्द्रीय विद्यालयों में शैक्षिक सत्र पहली अप्रैल से आरंभ होता है, वहीं दिल्ली सरकार व यहां के शिक्षा विभाग के आवश्यक नियंत्रण के अभाव में दिल्ली में चल रहे कई पब्लिक स्कूलों का शिक्षा सत्र स्कूलों की अपनी मनमर्जी से प्राय: मार्च माह में ही शुरू हो जाता है, इससे उन अभिभावकों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जो किन्हीं कारणोंवश अपने बच्चों का स्कूल बदलवाना चाहते हैं। ये परेशानियां इसलिए और बढ़ जाती हैं कि लगभग सभी पब्लिक स्कूल कक्षा 8 तक की किताबें निजी प्रकाशकों की लगवाते हैं, कापियां अपने विद्यालयों की ही लगवाने को मजबूर करते हैं तथा यूनिफार्म तो अलग होती ही है। वे धनोपार्जन का कोई अवसर खोना नहीं चाहते। शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों और दिल्ली सरकार को चाहिए कि वे यह सुनिश्चित करें कि सभी पब्लिक स्कूलों का शिक्षा सत्र (2008-0पहली अप्रैल से ही आरंभ हो।ड्ढr श्रीमती रागिनी सिंह, रोहिणी, दिल्ली शिक्षकों की भी हो यूनिफॉर्म विद्यालयों में बच्चों के लिए ड्रेस कोड होता है। जिससे सभी बच्चे एक जैसे दिखते हें। उनमें कोई अमीर-गरीब का अंतर नहीं होता। रोजाना एक-सी ड्रेस में जाने में छात्र नीरसता का आभास करते होंगे। वे सप्ताह में उस दिन का इंतजार करते होंगे जब उन्हें मनमाफिक कपड़े पहनने की छूट होती है। लेकिन ये ड्रेस कोड जरूरी है। वकीलों के लिए, कुछ निजी कार्यालयों में कार्य करने वालों की यूनिफार्म की बाध्यता होती है। यूनीफार्म की बाध्यता को बुरा नहीं कहना चाहिए। बल्कि यह एक जगह काम करने वालों को एक सूत्र में बांधती है। इस संबंध में एक जरूरी तथ्य है बच्चों के साथ-साथ अध्यापकों के लिए भी ड्रेस होनी चाहिए। ऐसा न होने से उनमें एकरूपता नहीं दीखती अध्यापिकाएं इस मामले में फैशन की स्पर्धा करती नार आती हैं। उनमें बाकी टीचरों से अलग दिखाने की होड़ होती है। यह सरासर गलत है। स्कूल, कॉलेज की टीचरों के लिए ड्रेस कोड होना चाहिए।ड्ढr दिलीप कुमार गुप्ता, छोटी वमन पुरी, बरेली चतुराई रेलमंत्री की केन्द्रीय रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव ने आगामी लोकसभा के चुनावों को ध्यान में रखकर के बजट प्रस्तुत किया है। बजट में वृद्ध, विकलांग, इंटर तक के छात्र, बी.ए. तक की छात्राआें के अलावा आम नागरिकों के हितों को ध्यान में रखकर के सराहनीय कदम उठाए गए हैं। इन घोषणाआें से होने वाले नुकसान की भरपाई भी बड़ी चतुराई से तत्काल की टिकटों पर दरों में वृद्धि कर उसकी पूर्ति की है।ड्ढr दिनेश गुप्त, पिलखुआ, उत्तर प्रदेश भारतीयता का गर्व सिर्फ विदेश में जब सुनीता विलियम्स स्पेस यान से लौटती है या कल्पना चावला शहीद होती हैं, तो हम सब भारत की बेटियां कह कर सिर ऊंचा करते हैं। या मारीशस में अथवा इंग्लैंड में भारतीय मूल का व्यक्ित ऊंचा आेहदा पाता है, तो गर्व करते हैं। इसके विपरीत देश में महाराष्ट्र-बंगाल में भाषा व प्रांत का भेद करके हिंसा फैलाते हैं या असम में हिन्दीभाषियों की हत्याएं होती हैं। विदेश में बसे भारतीय हैं तो किसी प्रांत या भाषा का प्रश्न नहीं उठता। वहां कोई भेद नहीं। पर यहां भेद और नफरत काोहर है। सुनीता के विलियम होने पर आपत्ति नहीं है। ईसाइयों पर हमले कर हम किस भारतीयता का परिचय देते हैं? वोट की राजनीति के तहत मुस्लिमों का कत्लेआम होता है। सत्य और अहिंसा का देश स्वार्थ में असत्य और हिंसा से परहेज नहीं करता। ऐसा क्यों?ड्ढr जी. के. स्नेही,अर्पिता नारा खेड़ा, उज्जन, मध्य प्रदेश खेलमंत्री की आखों पर पर्दा पिछले दिनों देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई में जिस तरह से राष्ट्रीय तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और फिल्मी सितारों ने क्रिकेटरों को खरीदने की बोली लगाई, उससे अब कई सवाल उठ रहे हैं, लगता है क्रिकेट अब खेल ना रहकर जुआ बन गया है। अगर इतना पैसा हमारे राष्ट्रीय खेल हॉकी में लगाया जाता तो भारतीयों में हॉकी को लेकर उम्मीद जगती। लगता है खेलमंत्री की आंखों पर पर्दा है जो शायद कभी उठाया नहीं जाता, क्या बात है कि खेलमंत्री हॉकी के बढ़ावे के लिए कुछ योजनाएं नहीं बनाते। हॉकी अपने ही घर में बेआबरू हो रही है। मुझे बहुत दुख है मुझे ही क्या सभी भारतीयों को।ड्ढr सैय्यद अली अख्तर, जामिया नगर, नई दिल्लीं

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