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..लेकिन अभी तक तो सपना ही है खूबसूरत बौद्ध स*++++++++++++++++++++++++++++र्*ट

प्रदेश मंे बौद्ध स*++++++++++++++++++++++++++++र्*ट के विकास की योजनाएँ तो बहुत बनाई गई। कुशीनगर से कपिलवस्तु तक विकास की ऐसी खूबसूरत तस्वीर दिखाई गई लेकिन इनमें से अधिकांश को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका। ताजा स्थिति यह है कि योजनाआें की कंसलटेंसी शुल्क को लेकर ही बौद्ध स*++++++++++++++++++++++++++++र्*ट के विकास का मामला अटक गया है। प्रदेश सरकार के अधिकारी कभी भारत सरकार की आेर देखते हैं तो कभी कंसलटेंट की आेर।ड्ढr भारत सरकार ने बौद्ध स*++++++++++++++++++++++++++++र्*ट फेज एक जापान की मदद से विकसित करने की योजना 1में स्वीकृत की थी। राज्य सरकार ने बौद्ध स*++++++++++++++++++++++++++++र्*ट के विकास के लिए 25रोड़ रुपए के प्रोजेक्ट तैयार किए और अपनी रिपोर्ट केन्द्र सरकार को भेज दी। केन्द्र ने जापान की वित्तीय संस्था जे बी आई सी को यह रिपोर्ट पड्डष््रेषित कर दी। राज्य सरकार ने कहा कि इस योजना के पहले चरण का काम पूरा हो चुका है, इसलिए दूसरे चरण के लिए 1062 करोड़ रुपए दिए जाएँ। जे बी आई सी ने इस योजना के लिए 680 करोड़ रुपए देने के लिए सहमति दी और कहा कि प्रथम चरण मंे वह 3रोड़ रुपए जारी करेंगे और बाकी राशि काम होने के बाद दी जाएगी।ड्ढr भारत सरकार ने अब इस काम को कराने के लिए कंसलटेंट की तलाश शुरू की। भारत सरकार ने जब इसके लिए निविदा आमंत्रित की तो दो कंपनियों ने ही हिस्सा लिया। इसमें एक कंपनी निप्पॉन कॉय जापान की थी और दूसरी टाटा कंसलटेंसी। लेकिन इन कंपनियों ने कंसलटेंसी शुल्क इतना ज्यादा माँग दिया कि योजना जहाँ की तहाँ रुक गई। इन कंपनियों ने 124 करोड़ रुपए कंसलटेंसी के माँगे। यह राशि इस परियोजना की लागत का 3प्रतिशत थी। जबकि कंसलटेंसी के लिए 51 करोड़ रुपए खर्च किए जाने का प्रस्ताव था। सवाल यह उठा कि अगर कंसलटेंट पर इतना धन खर्च कर दिया जाएगा तो काम कैसे होगा। काफी दिनों तक सरकार और कंसलटेंट के बीच शुल्क कम किए जाने के लिए पत्राचार होता रहा, लेकिन कंसलटेंसी शुल्क तो कम नहीं हुआ, हाँ, निर्माण की लागत जरूर बढ़ गई। इस तरह बौद्ध स*++++++++++++++++++++++++++++र्*ट का विकास कंसलटेंट को लेकर लटक गया है।

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