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पाक में जेहाद के दौर में मोहब्बत का तराना

पाकिस्तान में मोहब्बत की उड़ानें भरना आसान नहीं है, जहां प्यार के पंछी देश की नैतिकता का ठेका उठाए फिरने वाले ‘अल-बरकाएदा’ के लोगों के गुस्से से बचने के लिए ‘बुर्का बाजारों’ में चोरी छिपे नजरें मिलाते हैं। पाकिस्तान के अजोका थियेटर की सबसे नयी संगीतमय प्रस्तुति ‘हसीना की कहानी, खूबरू की जुबानी’ पुराने पड़ चुके मूल्यों का जम कर मजाक उड़ाता है। इस व्यंग्यात्मक नाटक का यहां के एनआईसी आडिटोरियम में बीती रात प्रदर्शन किया गया। इस प्रस्तुति ने यहां के लोगों को बहस-मुबाहिसे का अच्छा-खासा मसाला दे दिया है। इस नाटक की कहानी एक युवा जोड़े- हसीना और खूबरू के इर्दगिर्द घूमती है, जो पाकरे व बुर्का बाजारों में बुर्का पहन कर मिलते हैं और हर बार उन्हें दकियानूस बुर्का ब्रिगेड के लोग तंग करते हैं। हसीना और खूबरू एक ऐसी दुनिया में रहते हैं, जहां ‘बुर्का विजन’ नामक एक लोकप्रिय टीवी चैनल है, जो अक्सर ब्रेकिंग न्यूज के बतौर बुर्का ले भागने वालों की खबरें प्रसारित करता है। वहां के राजनीतिज्ञ खुल्लमखुल्ला कहते हैं कि वे बुर्का की राजनीति करते हैं। वे कहते हैं, ‘बुर्का है तो हम हैं, हम हैं तो बुर्का है।’ वहां के प्यार करने वाले युवा बुर्का-ए-बालीवुड के ये गीत गाते हैं- ‘बुर्के के पीछे क्या है’ और ‘बुर्के में रहने दो बुर्का न उठाआे’। वे ‘बुर्का भांगड़ा’ पर थिरकते हैं। वहां बुर्का बिन बतीन से अलग दो मुल्ला रेडियो भी हैं जो श्रोताआें से कुछ ऐसे सवाल पूछते हैं कि औरतों के लिए सलवार की लंबाई क्या होनी चाहिए? मदरे को सूट व टाई पहनने की अनुमति होनी चाहिए? तीखे व्यंग्य से दर्शकों को लोटपोट कर देने वाले इस नाटक का अंत उस वक्त दुखद हो जाता है, जब कठमुल्ला बुर्का ब्रिगेड प्यार करने के जुर्म में हसीना और खूबरू को फांसी पर लटका देता है। शाहिद नदीम द्वारा लिखित व निर्देशित इस नाटक में दकियानूस विचारों की बुराइयों की जम कर खबर ली गई है, जो काफी कु छ देश के वास्तविक हालात को प्रतिबिम्बित करता है। नाटक देश के दोहरे चरित्र वाले राजनीतिज्ञों को बेनकाब करता है। संगी फाउंडेशन ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर इसका आयोजन किया था।ं

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  • Web Title: पाक में जेहाद के दौर में मोहब्बत का तराना