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बंदरबाँट के चक्कर में नहीं बँटी बजट की पंजीरी

बंदरबाँट के चक्कर में बजट का दस करोड़ रुपया प्रदेश के कॉलेजों को नहीं बँट पाया। अशासकीय महाविद्यालय आर्थिक तंगी झेल रहे हैं, लेकिन बजट का पैसा सालभर से खजाने में रुका पड़ा है। वित्तीय वर्ष खत्म होने में केवल इक्कीस दिन बचे हैं। अब सरकार नीति बना रही है कि कितना पैसा किस कॉलेज को दिया जाए। जब तक नीति बनेगी और प्रस्ताव माँगा जाएगा तब तक वित्तीय वर्ष खत्म होने के कारण धनराशि लैप्स हो सकती है।ड्ढr यह हाल है उच्च शिक्षा विभाग का। राज्य में करीब 335 अशासकीय महाविद्यालय हैं। इन कॉलेजों में आधारभूत सुविधाआें के विस्तार के लिए वर्ष 2007-2008 के बजट में दस करोड़ रु. का प्रावधान किया गया था। विभाग के पूर्व प्रमुख सचिव आरके मित्तल ने इस धन के वितरण के लिए एक प्रस्ताव तैयार किया था। इसमें प्रावधान था कि 10 से 1े बीच जो कॉलेज अनुदान सूची पर आए उन्हें इस बजट से मदद दी जाए। इन कॉलेजों को ‘परफॉरमेंस’ के आधार पर दो से दस लाख रु. की मदद दी जाए जिससे वह टूटे भवन का निर्माण, कॉलेज में पेय जल व्यवस्था आदि काम करवा सकें। इस धन से कॉलेज शौचालय बनाने के अलावा कोई नया निर्माण कार्य शुरू नहीं कर सकता था। कॉलेज चाहे तो डिजिटल लाइब्रेरी के लिए यह धन खर्च कर सकता था। कॉलेजों को दो से दस लाख रु. तक मदद देने के पीछे मंशा यह थी कि अधिक से अधिक कॉलेजों को बजट का फायदा मिल सके। इस प्रस्ताव को वित्त विभाग ने भी हरी झंडी दे दी थी।ड्ढr अफसर चाहते थे कुछ कॉलेजों को ही धन मिले : पृष्ठ 12

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