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किसान कर रहे इंटरनेट से मार्केटिंग

प्राचीन मगध साम्राज्य का ऐतिहासिक गया जिला कृषि क्रांति की दहलीज पर दस्तक देने लगा है। सिंचाई साधनों की कमी की परवाह न करते हुए यहां के किसान न सिर्फ वैज्ञानिक तरीके से खेती कर रहे हैं बल्कि उत्पादों की मार्केटिंग (विपणन) के लिए इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं। इंटरनेट पर वे फसल की क्वालिटी, प्रयुक्त जैव या कार्बनिक खाद का पूरा विवरण तथा कीमत जारी कर रहे हैं। इसके कारण वे बिचौलिये तथा साहूकारों की मनमानी से तो बच ही रहे हैं साथ ही उन्हें बढ़िया दाम भी मिल रहा है।ड्ढr ड्ढr संचार क्रांति से उन्हें बाजार के संकट से निजात मिल गई है। गया जिले में सिंचाई साधनों की जबर्दस्त कमी है। नतीजा है अधिसंख्य किसान पारंपरिक खेती से अलग नहीं हट पाते और कोई प्रयोग करने का जोखिम नहीं उठा पाते। लेकिन, रोजगार की बढ़ती मांग और कृषि पर बढ़ते दबाव ने खेती में मौलिक परिवर्तन की राह प्रशस्त की है। अब वैसे किसान जो ‘एकला चलो’ की तर्ज पर कुछ विशेष करने में असमर्थ समझ रहे हैं वे सामूहिक खेती की आेर अग्रसर हुए हैं और अपने विान से कुछ नया करने की जुगत में जुटे हैं। ऐसे ही प्रयास से निकला एक नाम है मगध हर्बल डेवेलपर्स सोसायटी। इसके अध्यक्ष हैं शहर के गेवाल बिगहा निवासी श्रीनारायण प्रसाद सिंह जो सीसीएल, रांची में अधिकारी थे, सचिव हैं कुजापी के अजीत कुमार रौशन जो लॉ तथा प्रबंधन ग्रेजुएट हैं। इसके तीसरे सदस्य आईबी के अवकाश प्राप्त अधिकारी आरडी शर्मा हैं और बोधगया के संजीव कुमार चौथे मेम्बर हैं। इनमें किसी के पास उतनी जमीन नहीं है कि बड़े पैमाने पर एक जगह खेती कर सकें। फलस्वरूप इनलोगों ने को-ऑपरेटिव का गठन किया। इस फर्म के तहत इन लोगों ने जमुने गांव में किसानों से पट्टे पर सात एकड़ जमीन ली है।ड्ढr ड्ढr साझा प्रयास से इन छोटे किसानों ने इंटरक्रॉपिंग (मिश्रित खेती) का जो नमूना पेश किया है वह दूसरे कृषकों के लिए प्रेरणादायक सि हो रहा है। सोसायटी के सचिव अजीत कुमार रौशन बताते हैं कि पांच एकड़ में इस बार औषधीय फसल सफेद मूसली की खेती हुई है। इसमें छह लाख की लागत आई है। भगवान ने सब कुछ ठीकठाक रखा तो तकरीबन पच्चीस लाख की पूंजी खड़ी हो जाएगी। इसके बाईबैक के लिए हाजीपुर के एवी एग्रो प्रोडक्ट से बातचीत की गई है जो ढाई सौ रुपए प्रति किलो की दर से पूरी-की-पूरी मूसली खरीद लेगी। वे बताते हैं कि इसके साथ इंटरक्रॉप के रूप में हमलोगों ने जो लहसुन की खेती की है वह परंपरागत किसानों के लिए अनुकरणीय है। जब मूसली के पत्ते अक्तूबर में झड़ गए तो उसके ऊपर हमने लहसुन लगा दिये। इससे दो फायदे हुए। एक तो मूसली को आवश्यक छाया मिलने लगी जिसके लिए अतिरिक्त व्यवस्था करनी पड़ती है, दूसरा यह कि उसे दीमक से बचाव हो गया। चूंकि लहसुन की जड़ से एक ऐसे रसायन का स्रव होता है जो दीमक के लिए घातक होता है। अप्रैल माह में लहसुन निकालने के बाद मूसली निकाली जाएगी। लहसुन से भी हमलोगों को चार लाख की अतिरिक्त आय होगी। इन दोनों फसलों के किनारे-किनारे लगभग ढाई एकड़ में धनिया भी रोपी है। सुगंधित होने के कारण धनिया के पत्ते मवेशी नहीं खाते। नतीजतन, अन्य दो फसलों को भी मवेशी नुकसान नहीं पहुंचा पाएंगे।ड्ढr ड्ढr किसान बताते हैं कि इन फसलों में स्वयं की तैयार की गई वर्मी खाद का प्रयोग किया गया है। किसानों ने लहसुन की मार्केटिंग के लिए इंटरनेट के ‘याहू डॉट कॉम’ पर एड डाला है। उन्होंने बताया कि वर्मी कम्पोस्ट के उपयोग के कारण उन्हें लोकल मंडी से डेढ़ गुना अधिक मूल्य मिलने की संभावना है। आत्मा के निदेशक भी कोऑपरेटिव के प्रयास की सराहना करते हैं।

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