अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

जरदारी का कुर्सी मोह

पर्दे के पीछे रहकर जोड़-तोड़ बिठाने और येन-केन-प्रकारेण अथाह दौलत कमाने की ख्याति-कुख्याति पाने वाले आसिफ जरदारी अब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनने की जुगत में जुट गए हैं। महज पिछले 60 दिनों के दौरान उन्होंने इस पद के बारे में कहा कुछ और किया कुछ। बेनजीर की हत्या के बाद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के सह-अध्यक्ष बने जरदारी ने चुनाव प्रचार के दौरान घोषणा की थी कि पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार अमीन फहीम होंगे, यानी वह स्वयं किंगमेकर बने रहेंगे। नेशनल असेम्बली के चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के चंद दिनों के दौरान उन्होंने इस पद के लिए अन्य दावेदारों के नाम उछालने शुरू कर दिए। अब उन्होंने अपने सांसदों से कहा है कि पार्टी में पंजाब के किसी नेता को 0 दिनों के लिए प्रधानमंत्री बनाया जाएगा। इस दौरान उपचुनाव में चुनकर आने पर वह स्वयं प्रधानमंत्री बनेंगे। उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं है कि बार-बार रंग बदलने से पार्टी बदनाम होती है और उसमें कलह पैदा होना स्वाभाविक है। हकीकत में यही हो रहा है। यह बात फहीम के इस बयान से साफ है कि वह अब भी प्रधानमंत्री के दावेदार हैं। यह फहीम ही थे, जिन्होंने बेनजीर के सात साल के निर्वासन के दौरान फौजी तानाशाही को कड़ी टक्कर दी और कुशल नेतृत्व के बूते पार्टी को एकजुट रखा। ऐसे समर्पित नेता को किनारे कर देने से लगता है कि जरदारी को अपने राजनीतिक स्वार्थो के पार कुछ और दिखाई नहीं देता। पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) के साथ गठबंधन सरकार बनाने को लेकर समझौता करने में उन्होंने बहुत लंबा वक्त लगाया तो जनता को नहीं अखरा, क्योंकि देश में पहली बार इस तरह का लोकतांत्रिक प्रयोग किया जा रहा है। इसके लिए एक-दूसरे की शर्तो पर पर्याप्त सोच-विचार जरूरी माना गया। पर, प्रधानमंत्री पद को लेकर अब तक चली जरदारी की पैंतरेबाजी उनके कुर्सी मोह को ही दर्शाती है। यह भी संकेत देती है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र की भावी राह कठिन होगी। कहा जा रहा है कि पीएमएल (एन) के नवाज शरीफ भी फहीम को प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में नहीं हैं। इसके पीछे नवाज की राजनीतिक गणना शायद यह हो कि जरदारी के नाटकीय कारनामों से पीपीपी अपने आप अलोकप्रिय होकर कमजोर पड़ जाएगी। इसका राजनीतिक लाभ नवाज की पार्टी को मिल सकता है। प्रधानमंत्री पद के लिए उपयुक्त उम्मीदवार को चुनने में देरी का यही मतलब लगया जा सकता है कि जरदारी अपने पत्ते पूरी तरह नहीं खोल रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि उनकी आस्तीन में कुछ पत्ते और छिपे हों?ं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: जरदारी का कुर्सी मोह