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वर्णव्यवस्था के रास्ते से दलित हित!

उत्तरप्रदेश की सरकार के सूचना विभाग ने पिछले दिनों एक विज्ञापन जारी किया, जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में सफाई के लिए वाल्मीकि समुदाय के लिए एक लाख से अधिक स्थायी नौकरियां देने की घोषणा की गयी थी। इस पर किसी ने यह सवाल नहीं उठाया कि सफाई का काम उस समुदाय के लिए आरक्षित करना जो उसी पेशे के चलते लंबे समय से वर्णसमाज के हाथों प्रताड़ना और भेदभाव का शिकार होता रहा है, आखिर किस मायने में ‘ऐतिहासिक निर्णय’ कहा जा सकता है। क्या यह एक तरह से जन्म पर आधारित उसी व्यवस्था को मजबूत करने का काम नहीं है, जिसका कहर अनुसूचित जातियों पर खासकर वाल्मीकियों पर बरसता रहा है। किसी भी दल ने इस पर कुछ कहा नहीं है। उल्टे एक राष्ट्रीय अख़बार ने भी इस ‘ऐतिहासिक निर्णय’ के संभावित चुनावी फायदे की ही बात की। किसी ने यह बात भी रेखांकित नहीं कि आज़ादी के 61 साल बाद भी 8 लाख से अधिक लोग (जिनमें पच्चानब्बे फीसदी महिलाएं हैं) संविधान द्वारा लगायी गयी पाबंदी के बावजूद सर पर मैला ढोते हैं या हर साल 28 हजार से अधिक लोग मुल्क के सीवर में जहरीली गैस से मरते हैं, और इस काम में अनुसूचित जातियों के लोग ही अधिकतर लगे हैं, ऐसी स्थिति क्या बताती है। फूले-अम्बेडकर की अगुआई में वर्णव्यवस्था की उत्पीड़नकारी व्यवस्था का शिकार इन तबकों को इस गुलामी से मुक्ित दिलाने के लिए जो भी कोशिशें हुइर्ं, उनकी सारवस्तु इसी समझदारी पर आधारित रही है कि अगर ऐसे काम करने से या ऐसे पेशों में लिप्त रहने के बहाने अगर उन्हें प्रताड़ित किया जाता है तो वह उन पेशों को छोड़ें। मार्च 1में डॉ अम्बेडकर की अगुआई में जो ऐतिहासिक महाड़ सत्याग्रह किया गया था, उसके घोषणापत्र में इस बात को प्रमुखता से रखा गया था। डॉ अम्बेडकर ने लोगों का आवाहन करते हुए कहा था,’ तीन चीजों का तुम्हें परित्याग करना होगा। उन कथित गंदे पेशों को छोड़ना होगा, जिनके कारण तुम पर लांछन लगाए जाते हैं। दूसरे, मरे हुए जानवरों का मांस खाने की परम्परा को भी छोड़ना होगा। और सबसे अहम है कि तुम उस मानसिकता से मुक्त हो जाआे कि तुम ‘अछूत’ हो।’ उनका यह भी कहना था कि ‘क्या यहां हम इसलिए आये हैं कि हमें पीने के लिए पानी मयस्सर नहीं होता है? क्या यहां हम इसलिये आए हैं कि यहां के जायकेदार कहलानेवाले पानी के हम प्यासे हैं? नहीं, दरअसल इंसान होने का हमारा हक जताने हम यहां आए हैं।’ बाद के दिनों में जो सामाजिक आन्दोलन विकसित हुआ, उसमें आन्दोलन के एक तरीके के तौर पर इस रूप को भी अपनाया गया, जहां लाखों की तादाद में दलितों ने उन पेशों का परित्याग किया, जिसकी वजह से उन पर लांछन लगता था। डॉ अम्बेडकरका केन्द्रीय नारा था ‘शिक्षित बनो, संगठित हो, संघर्ष करो।’ दलितों को लिखने-पढ़ने से लेकर, व्यापार करने, हथियार रखने, यहां तक कि ईश्वर के दर्शन से भी वंचित रखा गया था और एक तरह से यह नारा इस व्यवस्था को चुनौती देता था। यह सही है कि डॉ अम्बेडकर के इस आवाहन का विभिन्न दलित जातियों पर अलग-अलग असर रहा। पिछले दिनों सफाई के पेशे में लिप्त स्वच्छकार समुदाय के युवाआें की तरफ से कई स्थानों से यह ख़बर भी आयी थी कि उन्होंने ‘झाडू छोड़ो, कलम उठाआे’ का नारा दिया था। हालांकि इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि यह मुहिम स्वच्छकार समुदाय में अभी भी बहुत जोर नहीं पकड़ सकी है, और अभी भी प्रस्तुत समुदाय का अच्छा खासा हिस्सा उसी पेशे में लिप्त है, जहां उसे सदियों पहले ढकेल दिया गया था। अनुसूचित जातियों के लिए उन्हीं पेशों को आरक्षित करने की समझदारी रखने में उत्तर प्रदेश की सरकार या बसपा कोई अपवाद नहीं है। सत्ता की राजनीति में शामिल सभी दल इसी चिन्तन के वाहक हैं। यह अकारण नहीं कि पिछले दिनों अनुसूचित जाति और जनजातियों के कल्याण से सम्बधित केन्द्रीय विद्यालय संगठन और नवोदय विद्यालय की कमेटी अपनी जो सिफारिशें संसद के समक्ष पेश की गयी, इसमें यही बात प्रतिध्वनित हो रही थी। इसमें कहा गया था कि केन्द्रीय विद्यालयों और उसके कार्यालयों के लिए जरूरी सफाई कर्मचारी अनुसूचित जाति और जनजातियों की श्रेणी से ही भरती किए जाएंगे। दिलचस्प बात है कि कांग्रेस के नेतृत्ववाली हरियाणा सरकार ने भी पिछले दिनों दलित उत्थान को लेकर जो विज्ञापन प्रकाशित किया गया था, उसमें इसी बात को रेखांकित किया गया था कि ‘दलितों के लिए एक सुनहरा अवसर कि ग्यारह हजार सफाई कर्मचारी अनुसूचित जातियों से ही भरती किए जाएंगे।’ लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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  • Web Title: वर्णव्यवस्था के रास्ते से दलित हित!