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राजरंग

सूबे में चुनाव की खूब बयार बह रही है। सब खुश हैं। किसिम-किसम का चुनाव चिह्न् पाकर सब गदगद। जीत कर सब कुछ बदल कर रख देंगे, यही सोच रहे हैं। चुनाव चिह्न् के साथ बैनर और पोस्टर भी खूब छप रहे हैं। मुहल्ले में एक-एक पद पर 10-10 दावेदार। जीतेगा तो कोई एक। परिणाम के बाद कितनों के चेहरे लटकेंगे, यही सोच कर शहर के एक बुजुर्ग का चेहरा सूख गया है। पता चला कि सबको वोट देने का वादा कर बैठें हैं। दो प्रत्याशी तो उनके बगल में ही रहते हैं। एक जीता, तो रसगुल्ले खायेंगे और दूसरा हारा, तो उन पर क्या सितम ढहेगा कहना मुश्किल। एक दबंग है, तो दूसरा ठेकेदार। ऐसे और भी वार्ड में भी कई बड़े भइया सीना ठोंक कर चुनाव मैदान में खड़े हैं। एक अनार सौ बीमार है। पता चला कि जीतने पर मानदेय केवल हजार रुपया मिलेगा, तो चुनाव प्रचार का खर्चा कैसे निकलेगा? इसी जुगत में दो प्रत्याशी माथापच्ची करने में तीन दिन से डटे हैं। एक प्रत्याशी ने तो ससुराल से मिली गाड़ी बेच दी है। बस किसी ने चुनाव में खड़ा होने के लिए सनका दिया था। बीवी के तेवर गरम। कहती है-हार गये, तो बैलगाड़ी से घूमोगे क्या? प्रत्याशी ने कह दिया कि जानेमन-हारने की फिकर क्यों करती हो, सोचो जीत गये तो क्या होगा? ऐसी गाड़ियों की लाइन लगा देंगे। पत्नी पूछ बैठी कैसे? जबाव मिला-ये अंदर की बात है।

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