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वादे हैं, वादों का क्या..

निकाय चुनाव के बाद सही मायने में ग्रास रूट लेवल के लोगों की भागीदारी सत्ता में होगी। इस तरह यह चुनाव महत्वपूर्ण है। रांची नगर निगम चुनाव में जिस तरह एजुकेटेड लोग, युवाओं और महिलाओं की भागीदारी दिख रही है, उससे उम्मीद बंधती है। लेकिन कुछ प्रत्याशियों के वायदे सुनकर ऐसा लगता है, मानो उनका मकसद सिर्फ चुनाव जीतना है। उनके बयान में गंभीरता की कमी साफ झलकती है। मतदाताओं को इसे समझना होगा, तभी इस सुअवसर का सही लाभ मिलेगा। रांची । वोट लेने के लिए मतदाताओं को लुभाना कोई नयी बात नहीं। पर झूठ बोल कर भ्रम फैलाने को सही नहीं कहा जा सकता। कुछ प्रत्याशियों के वायदों पर गौर करिये। - मैं चुनाव जीत गया, तो शहर में बिजली की समस्या नहीं रहेगी। मैं चुनाव जीत गया, तो यहां अत्याधुनिक अस्पताल बनवा दूंगा। मैं चुनाव जीत गया, तो उच्च शिक्षा में क्रांति ला दूंगा। तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा दूंगा.. आदि-आदि।ड्ढr ये वायदे वार्ड काउंसिलर पद का चुनाव लड़ रहे लोगों के हैं। अब थोड़ा सोच कर देखिये। बिजली संकट का समाधान करने में सूबे के मुख्यमंत्री को पसीने छूट रहे हैं, अब भला वार्ड पार्षद बिजली समस्या दूर करने की बात कहे, तो इसे कितनी गंभीरता से लिया जा सकता है। दूसरे वायदे भी इसी तरह के हैं, जिसे पूरा करना वार्ड पार्षद के वश में नहीं है। फिर ऐसे वायदे क्यों कर रहे हैं लोग। इसे मतदाताओं को समझना होगा। गंभीर प्रत्याशियों की पहचान करनी होगी। ..हां चुनाव जितने के बाद सभी पार्षद एकजुट होकर सरकार पर इस तरह के मुद्दों पर दबाव बना सकते हैं। ऐसा हुआ, तो सकारात्मक बात होगी। पर एक प्रत्याशी इसे अगर अपने चुनावी वायदे में शामिल कर ले, तो यह बात कुछ पचती नहीं है। इस चुनाव की कई अच्छी बातों में से एक यह है कि मैदान में डटे ज्यादातर प्रत्याशी युवा हैं। महिलाओं की अच्छी-खासी भागीदारी है, न सिर्फ प्रत्याशी के तौर पर, बल्कि उनके समर्थकों के रूप में भी।

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