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सालाना डेढ़ करोड़

आईआईएम और आईआईटी से निकले नौजवानों की तनख्वाहें हमेशा ही चर्चा का विषय रही हैं। इस बार सालाना तनख्वाहों का करोड़ों में पहुंचना इसलिए विशेष है क्योंकि ये कयास लगाए जा रहे थे कि वैश्विक मंदी का कुछ असर इन तनख्वाहों पर पड़ता है या नहीं। नतीजे यह बता रहे हैं कि दुनिया में भले ही मंदी हो, लेकिन अत्यंत उच्चशिक्षित और कुशल लोगों की कमी है इसलिए उनकी मांग बनी रहेगी और उनकी कीमतें ऊंची चढ़ी रहेंगी। जाहिर है अमेरिका के सब प्राइम संकट का असर तो विश्व अर्थव्यवस्था पर हुआ है, लेकिन भारत समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, वह काफी हद तक स्थिति को संतुलित कर देता है। ये अर्थव्यवस्थाएं भी अपनी अंदरूनी ताकत के सहारे आगे बढ़ रही हैं। इसलिए अमेरिका की मंदी उनके उत्साह को कम नहीं कर पाई है। भारत में अब भी शिक्षित और कुशल नौजवानों की भारी कमी है और मौजूदा शिक्षा संस्थाएं इस कमी को पूरा नहीं कर पा रही हैं, बल्कि विशेषज्ञों का यह कहना है कि गर तेजी से बेहतर गुणवत्ता वाले उच्च शिक्षा संस्थान नहीं खोले गए तो यह कमी भविष्य में अर्थव्यवस्था की रफ्तार को कम कर सकती है। भारत में इस वक्त सेवा क्षेत्र में ही सबसे ज्यादा रोजगार निकल रहे हैं, लेकिन बहुत जल्दी ही भारत निर्माण क्षेत्र का बड़ा पॉवर हाउस बनेगा और निर्माण क्षेत्र में भी अब पूंजी से ज्यादा महत्वपूर्ण बौद्धिक संपदा है। ऐसे में देश के वंचितों, गरीबों को इस तरक्की में शामिल करने का एकमात्र जरिया उन्हें शिक्षा उपलब्ध करवाना है। भारत जैसे राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था न केवल वैश्विक मंदी से अपेक्षाकृत अप्रभावित रह सकती है बल्कि वह इससे उबरने का इंजन भी है। ऐसे में अगर हमारे नौजवान करोड़ों रुपए कमाने लगें तो यह खुशी की बात है। बस हमें यह ख्याल रखना है कि आगे बढ़ने के जबे, प्रतिभा और मेहनत के धनी और बहुत सारे नौजवान हैं, जिन्हें तरक्की के अवसरड्ढr मिलना जरूरी हैं।

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