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छोटे राज्यों की मांग कितनी जायज?

छोटी रियासतों में सबका विकास होगा चौ. अजित सिंह, राष्ट्रीय अध्यक्ष, नेशनल लोकदल प्राकृतिक संसाधनों से मालामाल होने के बावजूद पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जनता इंतेहाई बदतर हालात में जिन्दगी बसर करने को मजबूर है, और इनके इन संसाधनों पर दूसरों का कब्जा है। उत्तर प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्र पूरे राज्य की कृषि के लिहाज से विशेष महत्व रखते हैं, पर वहां न सड़कें हैं, न बिजली-पानी, न स्कूल और न ही रोजी-रोटी के दीगर साधन हैं। यह पूरा इलाका सरकारी उपेक्षा का शिकार है क्योंकि इनका दुख-दर्द सुनने समझने वाला हमारे सिवाए कोई नहीं है, सरकार के लोग यहां आना तक मुनासिब नहीं समझते, तो भला विकास के सपने देखना बेमानी सा लगता है। इस इलाके की तरक्की का बस एकमात्र हल यही है कि इसे जल्द एक अलग राज्य ‘हरित प्रदेश’ का दर्जा दिया जाए।ड्ढr प्रदेश की राजधानी इस इलाके से बहुत दूर है, यहां के गरीब-किसानों को अपने छोटे-छोटे कामों के लिए बार-बार लखनऊ दौड़ना पड़ता है। बड़ा राज्य होने से इसके मामलों पर फैसला देर में आता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों की बहुलता और इनका मुख्य पेशा खेती है। इनकी पैदा की गई फसलों व अनाज से पूरे उत्तर प्रदेश का भला होता है, बदले में इनको वाजिब हक भी नहीं मिलता। बाबू जी (चौधरी चरण सिंह) ने पूरी जिन्दगी इन्हीं किसानों के विकास और तरक्की की लड़ाई लड़ी। उनका सपना था कि इन ग्रामीण इलाकों को सड़कों से इस तरह जोड़ दिया जाए कि आवागमन काफी सुगम हो, जिससे किसानों की शहरों तक सीधे-आदम-व-रफ्त हो। राज्य के जितने भी मुख्यमंत्री अब तक रहे उन सभी ने इस क्षेत्र की आेर से आंखें मूंदे रखी। आज पूरा देश आर्थिक विकास, भूमंडलीकरण और उदारवाद का स्वाद चख रहा है, लेकिन यह क्षेत्र आज भी शिक्षा, रोजगार, परिवहन, बिजली, पानी, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाआें के लिए तरस रहा है। अब तभी चुस्त-दुरुस्त होगी की जनता जब ‘हरित प्रदेश’ बनेगा। तभी जनता की ख्वाहिशें पूरी हो सकेंगी। इस मांग के पीछे राजनैतिक स्वार्थ एम. वीरप्पा मोइली, पूर्व मुख्यमंत्री कर्नाटक अलग राज्यों की मांग विकास एवं समृद्धि की नहीं बल्कि पूर्णतया राजनीतिक स्वार्थ है। आज बुंदेलखंड, हरित प्रदेश, महाराष्ट्र में विदर्भ, आंध्र प्रदेश में तेलंगाना, असम में बोडोलैंड, पश्चिम बंगाल में गोरखालैंड, गुजरात में सौराष्ट्र औ कच्छ, बिहार में मगध व भोजपुरी राज्य की मांग हो रही है, वह सिर्फ राजनैतिक स्वार्थ है, जिसमें स्थानीय नेता अपना राजनैतिक वजूद तलाश रहे हैं। अलग राज्यों के गठन का मसला इतना गर्मा चुका है, जिससे लगने लगा है कि कल यह मांग भी उठने लगेगी कि अब एक संसद से काम नहीं चलता इसलिए एक संसद और बने। अब तक सभी सरकारें गठबंधन करके ही जुमा-जुमा दो या तीन पार्टियों के समर्थन से सरकार बना लेती थी, लेकिन अब संसद में 20-20 दलों का महाकुंभ होगा, तो वह कहां समा पाएगा, शायद न संसद में न ही देश में। राज्यों के बंटवारे को ध्यान में रखकर 1में बने राज्य पुनर्गठन आयोग कानून के क्षेत्रीय परिषदों के गठन का प्रावधान किया गया, लेकिन इससे बात बनी नहीं। जाहिर है कि आज कोई नेता किसी व्यक्ित विशेष के उद्धार की बारे में नहीं सोच रहा, वह सिर्फ इलाकाई भाषा, जबान के सहारे अपना झंडा गाड़ना चाहता है। यह बहुत शर्मनाक है आज हमारा देश मजहब, भाषा एवं इलाकाई तथ्यों में उलझा है। कोई पूरे मुल्क की बात नहीं करता। अगर छोटे राज्यों की हकीकत देखें, तो वहां अधिकतर स्थानीय गुंडों-माफियाआें का दबदबा होता है, जैसे झारखंड में नक्सलियों का बोलबाला है। देश में प्रशासनिक आधार पर चाहे कितने विभाजन कर दीजिए, क्षेत्रीयता एवं उसके वशीभूत भारतीय भू-सीमा के अंदर भी अलगाव की विचारधारा भले कुछ अंगों में असंतोष से उत्पन्न होती हो लेकिन कई बार उसके पीछे राजनीतिक क्षत्रप बनने की भावना भी प्रबल होती है। वैसे क्षेत्रीय असंतोष केवल राज्यों के खिलाफ नहीं होता, इसकी जड़ राष्ट्रीय नीतियों एवं व्यवहारों में भी निहित है। इनका निदान छोटे राज्यों से कैसे हो सकता है?

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  • Web Title: छोटे राज्यों की मांग कितनी जायज?