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सरहद न खींचें देश के भीतर

यह हमारी बदकिस्मती ही है कि धार्मिक त्योहारों तक को अचानक ही क्षेत्रीयतावादियों ने निशाना बनाना शुरू कर दिया है। छठ जैसा त्योहार कहां मनाया जाता है यह कभी अहम नहीं हो सकता क्योंकि इसके साथ बिहार और उत्तर प्रदेश के करोड़ों लोगों की आस्थाएं और भावनाएं जुड़ी हैं। हमें दूसरों की भावनाआें, आस्थाआें और परंपराआें का सम्मान तो सीखना ही होगा। इससे भी ज्यादा बदकिस्मत बात यह है कि धार्मिक त्योहार का यह मुद्दा तो एक बहाना भर है, उनका असल निशाना तो विस्थापितों के अधिकार हैं। यह एक ऐसा मसला है, जिस पर दुनियाभर में खासी बहस चली है। ब्रिटेन या अमेरिका में किसी ने कभी भी यह मांग नहीं की कि भारतीय त्योहार दूसरे क्षेत्र के हैं और उन्हें मनाने पर रोक लगनी चाहिए। अमेरिका के लोगों ने तो यह भी नहीं पूछा कि व्हाइट हाउस ने भारतीय त्योहार दीपावली को भला क्यों मनाया। विस्थापितों के अधिकार और कर्तव्यों में यह बात पूरी तरह जुड़ी हुई है कि उन्हें शरण देने वाला देश या राज्य, अपने धर्म, अपनी परंपराआें के पालन की उनकी आजादी को नहीं छीनेगा। बशर्ते कि जब तक वह स्थानीय आबादी की सुरक्षा या उसके किसी हित के लिए खतरा न हो। इसी के साथ ही विस्थापित को शरण देने वाले देश या राज्य की परंपराआें, आस्थाआें वगैरह का भी सम्मान करना होगा। यह भले ही कहीं लिखित नियम न हो, लेकिन दुनियाभर में इसे माना जाता है और अपने देश में भी इसके अनुसरण की उम्मीद की जाती है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के ताजा आंदोलन की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि वह उन सिांतों के ही खिलाफ है जिसकी हम दुनियाभर में वकालत किया करते हैं। भारत उन देशों की अगली कतार में है, जिन्होंने हमेशा ही दुनिया में लोगों की मुक्त आवाजाही का समर्थन किया है। देश के भीतर ऐसी मुक्त आवाजाही भी उन्हीं कारणों से होती है जिनसे दो देशों के बीच मुक्त आवाजाही होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि हर देश की अपनी प्रभुसत्ता होती है जिसके कारण एक देश से दूसरे देश में आना-जाना कानूनी अधिकार नहीं होता।ड्ढr अगर हम देश की 2001 की जनगणना के आंकड़े देखें तो महज 423 लाख लोगों ने ही अंतरराज्यीय विस्थापन किया है जो कुल विस्थापन का 13.8 फीसदी ही है। ये आंकड़े महज इतना ही बताते हैं कि अपने देश में गांव से शहर और एक से दूसरे जिले के बीच विस्थापन ज्यादा होता है, राज्यों के बीच में कम। और राज्यों के बीच होने वाले इस विस्थापन में भी खास बात यह है कि विस्थापित होने वाली महिलाआें की संख्या 226 लाख है, जबकि पुरुषों की 1लाख। बिहार और उत्तर प्रदेश से होने वाला विस्थापन क्रमश 34 लाख और 51 लाख है। दूसरे राज्यों से महाराष्ट्र को होने वाला विस्थापन 70 लाख है, जबकि महाराष्ट्र से दूसरे राज्यों को होने वाला विस्थापन 21.6 लाख, और महाराष्ट्र की इस आबादी ने कहीं कभी कोई खतरा भी महसूस नहीं किया। विस्थापन के आंकड़ों को अगर और आगे देखें तो 37.6 फीसदी पुरुष नौकरी व रोजगार की तलाश में अपना घर छोड़ते हैं, 6.2 फीसदी शिक्षा के लिए, 2.ीसदी व्यापार के लिए और 10.4 फीसदी जन्म के तुरंत बाद या किसी अन्य कारण से। औरतों के मामले में 65 फीसदी औरतें शादी के बाद दूसरे राज्य में अपने ससुराल या पति के पास चली जाती हैं, सिर्फ 3.2 फीसदी ही नौकरी के लिए विस्थापित होती हैं और महज 1.3 फीसदी शिक्षा के लिए दूसरे राज्य में जाती हैं। लेकिन विस्थापन को लेकर जो ताजा राजनीति चल रही है उससे कई राजनैतिक और आर्थिक मुद्दे उठते हैं। सबसे पहले तो महराष्ट्र नवनिर्माण सेना का जो डर है, वह दुनियाभर में व्यक्त किया जाता रहा है। यह कहा जाता है कि बाहर के लोग स्थानीय लोगों के रोजगार के अवसर हड़प लेते हैं, समाज के सांस्कृतिक ताने-बाने को छितरा देते हैं, उनकी वजह से नागरिक सुविधाआें और इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव पड़ता है। लेकिन एक के बाद एक अध्ययनों से यही पता चला है कि ऐसी बातों में अतिश्योक्ित के सिवा कुछ भी नहीं। नीति नियामकों को नगर खासकर नए नगर और उपनगर के विस्तार की संभावनाआें का ध्यान रखकर इंफ्रास्ट्रक्चर को विकसित करना चाहिए। भारत में और सारी दुनिया में विस्थापित संपत्ति का निर्माण करते हैं और अर्थव्यवस्था में स्पर्धा लाते हैं। विकसित देशों को तो कुशल हाथों की कमी के कारण अक्सर सुविधाआें को आउटसोर्स करना पड़ता है या बाहर से कुशल कर्मचारियों को बुलाना पड़ता है। यही समृद्ध राज्य भी करते हैं। पंजाब, हरियाणा और केरल की कृषि और सूरत का जेवरात व जवाहरात उद्योग भी बिहार से लाए गए लोगों के ही भरोसे चलता है। बड़ी इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाआें के लिए भी दूसरे राज्यों से भारी संख्या में मजदूर लाए जाते हैं। इसके अलावा चिकित्सा, उच्च शिक्षा, परिवहन और शोध जैसे कामों में विस्थापित बड़ा योगदान देते हैं। बाजार की ताकतें इसी तरह बढ़ती हुई मांग का आपूर्ति से संतुलन बिठाती हैं। दूसरा मुद्दा है विस्थापितों द्वारा अपनी कमाई वापस अपने घर भेजने का। विस्थापित अपने परिवार को बेहतर जीवन स्तर देने के लिए अपना घर छोड़ते हैं ताकि वे उन्हें जीवन के बेहतर साधन बेहतर शिक्षा आदि उपलब्ध करा सकें। इस कमाई से उन राज्यों को भी फायदा होता है जहां से वे आए हैं। तीसरा मुद्दा तेजी से हो रहे शहरीकरण का है। भारी तादाद में लोग गांवों से शहरों की आेर वैकल्पिक रोजगार की तलाश में आ रहे हैं। इसके लिए तेजी से नीतियों को बनाने की जरूरत है ताकि इस भीड़ को इन शहरों में व्यवस्थित किया जा सके। इसके लिए राज्यों को आपसी तालमेल को और बेहतर बनाना होगा ताकि विस्थापन की स्थिति में दोनों राज्यों को फायदा मिल सके। सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह के तनाव पैदा करके भारत के बाल्केनीकरण पर जो चिंता व्यक्त की है, वह जायज ही है। मशहूर अर्थशास्त्री प्रोफेसर जगदीश भगवती हमेशा ही सीमा विहीन देशों की वकालत करते रहे हैं। लेकिन विडंबना यह है कि हम देश के भीतर ही सीमा रेखाएं खींचने में लगे हुए हैं। इस पागलपन का तो कोई अंत ही नहीं होगा, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे ऐसे कई राज्य हैं तरह तरह की बोलियां, तरह तरह के क्षेत्र और परंपराएं हैं। इन सीमाआें को आखिर हम कब तक खींचते रहेंगे? इस तरह के अांदोलनों से भारत की अनेकता को ही नुकसान पहुंचेगा। फिर भी उम्मीद है कि आखिर में समझदारी भरे अर्थशास्त्र और समझदारी भरी राजनीति की ही जीत होगी।ड्ढr लेखक जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे के न्द्र सरकार मेंड्ढr सचिव और योजना आयोग के सदस्य रह चुके हैं

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