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हॉकी के सूखते पेड़ को पानी चाहिए

सेंटयागो (चिली) में भारतीय हॉकी इमारत यों अचानक ही नहीं ढही। चेतावनियां तो बरसों से मिल रही थीं कि इसकी बुनियाद कमजोर हो रही है, दीवारें थरथराने लगी हैं, पर हॉकी के कर्णधार, प्रशिक्षक, खिलाड़ी, चयनकर्ता सभी सपने दिखाते रहते थे कि भारतीय हॉकी निश्चित रूप से अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा पुन: प्राप्त कर लेगी। आखिर वही हो गया, जिसका अंदेशा था। सपने चूर-चूर हो गए और भारतीय हॉकी की इमारत धराशाई हो गई। अंतरराष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिताआें में हमारी टीमों का निरंतर खराब प्रदर्शन, आेलंपिक्स, विश्व कप और एशियाई खेल हॉकी में हम पहले, फिर दूसरे और तीसरे स्थानों पर नीचे की तरफ लुढ़कते हुए सातवें और आठवें स्थानों तक पहुंच गए। हॉकी के कर्ताधर्ताआें ने यह सब देख कर भी अनदेखा कर दिया। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताआें के लिए जाने से पहले वे जीत कर आने के खोखले दावे दोहराते रहे। और नौ मार्च के मनहूस दिन वह हो गया, जिसका आभास 1े मांट्रियल आेलंपिक से मिलना शुरू हो गया था, जब हम सातवें स्थान पर रहे थे। अस्सी वर्ष बाद भारतीय हॉकी पहली बार आेलंपिक में खेलने से वंचित हो गई। आरंभ हो गया एक दूसरे पर दोषारोपण और इस्तीफों का सिलसिला। हॉकी के जिस पौधे को ध्यानचंद, रूप सिंह, किशन लाल, बलबीर सिंह सीनियर, केडी सिंह ‘बाबू’, रणधीर सिंह जैण्टल आदि अनेक खिलाड़ियों ने अपनी मेहनत, साधना और समर्पण से सींच कर छायादार वृक्ष बनाया था, वह पेड़ अब सूख गया। जिम्मेदार हॉकी संघ है ही, पर खेल मंत्रालय, भारतीय खेल प्राधिकरण, प्रशिक्षक और चयनकर्ता भी हैं। जिम्मेदारी से तो मीडिया भी नहीं बच सकता, जिसने हॉकी को उतना महत्व नहीं दिया, जितना क्रिकेट, टेनिस, गोल्फ आदि को दिया जाता है। माना कि खेल मंत्रालय और सरकार भारतीय हॉकी संघ के कायरे में दखल नहीं दे सकते- क्योंकि हर खेल संघ स्वायत्तशासी संस्था है, किन्तु कोई न कोई तरीका तो इन खेल संघों पर अंकुश रखने का हो ही सकता है। आखिर खेल मंत्रालय और खेल प्राधिकरण सुविधाएं जुटाते हैं, टीमों को विदेश भेजने के लिए पैसा भी देते हैं और जो पैसा देता है, वह उसके खर्च का ब्योरा भी पूछ सकता है। क्या यह चयनकर्ताआें का दायित्व नहीं कि उपयुक्त प्रतिभाआें की खोज के लिए वे जिला और राज्य स्तर की प्रतियोगिताआें को देखें और उन पर नार रखें। देश में प्रतिभाओं की तो कमी नहीं।ड्ढr हमारे देश में 18में आरंभ किया गया कोलकाता का बेटन कप हॉकी टूर्नामेंट विश्व का प्राचीनतम और महत्वपूर्ण टूर्नामेंट है। अभी भी होता है, किन्तु कितने हॉकी प्रेमी उसके बारे में जानते हैं। समाचार पत्रों में भी कहीं खबर छप भी जाए, तो पांच-छह पंक्ितयों से अधिक नहीं। ऐसे ही अन्य ऐतिहासिक हॉकी प्रतियोगिताएं जैसे आेबदुल्लाह गोल्ड कप, आगा खां कप, सिंधिया गोल्ड कप हॉकी भी अतीत की बात होकर रह गए। और तो और राष्ट्रीय हॉकी तक का अता-पता भी नहीं लगता। यही नहीं 1में आरंभ किए गए नेहरू हॉकी टूर्नामेंट ने देश को कितने ही आेलंपियन खिलाड़ी दिए हैं। इसमें विदेशी टीमें भी भाग लेने आती हैं। लड़कियों का टूर्नामेंट भी यह सोसायटी आयोजित करती है, पर उसे प्रायोजक नहीं मिलते। इसमें संदेह नहीं कि क्रिकेट के प्रभाव से हॉकी भी अछूती नहीं रही। यदि इस खेल में अंतरराष्ट्रीय मैदानों पर, विशेष कर आेलंपिक्स में यदि हम जीतते रहते तो देश के खेलप्रेमियों और खिलाड़ियों में यूं हॉकी अपमानित होकर गर्त में नहीं चली जाती, किन्तु जिन्होंने खेल संघों में पंद्रह-पन्द्रह, बीस-बीस साल से सत्ता की कुर्सियां संभाल रखी हैं, ऐसी पराजयों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, भले ही वह हॉकी हो या कोई और खेल। आज आवश्यकता है हॉकी सहित सभी खेल संघों के ‘रहबरों’ पर अंकुश रखने की, विशेषकर सत्ता में वे कितने अर्से तक रह सकते हैं, इस बंधन में बांधने की। प्रतियोगिताआें में परिणाम अच्छे दें, यह शर्त लगाने की भी आवश्यकता हे। हॉकी फिर उभर सकती है- लंबा समय अवश्य लगेगा, पर इसके लिए हर तरह से समर्पित और जानकार लोग ही इसकी बागडोर संभालें, तभी बात बन सकेगी, वरना तो हम यही कहते रह जाएंगे-ड्ढr ‘देख कर फसल अंधेरों की हैरत कैसीड्ढr तूने खेतों में उजाला ही कहां बोया है।’ लेखक वरिष्ठ खेल समीक्षक व कमेंटेटर हैं

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