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एकाग्रता से सफलता

एक दो गोते लगाने के बाद अगर मोती हासिल नहीं होता, तो लोगबाग सागर के सिर सारा दोष मढ़ने लगते हैं, जबकि दोष उनकी अपनी गोताखोरी में ही होता है। छोटे और अहम सभी कायरे को सदा पूरा मन लगा कर कीजिए। इंसान हर किस्म की चुनौतियों और परीक्षाआें से लड़ने में अक्षम नहीं है। कमी होती है इरादे को पाने के दृढ़ निश्चय की। इंसान मन में कुछ भी करने का ठान ले, वह कर सकता है। ईश्वर समस्त वस्तु, जीव जगत का सम्पूर्ण योग है और उसका प्रतिरूप इंसान के भीतर है। ईश्वर कुछ भी कर सकता है, उसी प्रकार इंसान कुछ भी कर सकता है। बशर्ते इंसान अपनी अक्षय प्रकृति के साथ एकाकार होना सीख ले। एकाग्रता से बड़ा इंसान का कोई मित्र नहीं है।एक किसान ने कुआं खोदना शुरू किया। दस हाथ खोदने पर भी पानी नहीं निकला, तो वह निराश हो गया। दूसरी जगह खोदने लगा। फिर दूसरी जगह भी दस हाथ खोदने पर पानी नहीं निकला, तो तीसरी जगह खुदाई शुरू कर दी। इस प्रकार, पांच-सात स्थानों पर उसने खोदा, लेकिन कहीं पानी नहीं निकला। वह बेहद दुखी हुआ और निराश मन से घर लौट आया। अगले रोज उसने अपनी राम कहानी धर्म गुरु को सुनाई। धर्म गुरु उसे समझाते हुए बोले, ‘तुमने पांच स्थानों पर दस-दस हाथ खोद कर पचास हाथ भूमि खोदी। यदि तुम अलग-अलग न खोद कर एक ही स्थान पर इतना खोदते, तो तुम्हें पानी अवश्य मिल जाता। वास्तव में, तुमने धैर्य नहीं रखा आेर थोड़ा-थोड़ा खोद कर निर्णय बदल लिया। अब तुम एकाग्रता से एक ही स्थान पर खोदो और जब तक पानी न निकले, तब तक खोदना जारी रखो। तुम्हें सफलता अवश्य मिलेगी।’ किसान ने दृढ़ निश्चय के साथ एक बार फिर खोदना प्रारम्भ किया। लगभग बीस हाथ खोदते ही पानी का फव्वारा फूट पड़ा। साथ-साथ किसान के भीतर भी ज्ञान का फव्वारा फूटा कि एकाग्रता में सफलता की कुंजी छिपी है। राजा विक्रमादित्य के पास सामुद्रिक लक्षण जानने वाला एक ज्योतिषी आया। उनके सामुद्रिक लक्षणों को देख कर ज्योतिषी गहरी सोच में डूब गया- वास्तव में, सामुद्रिक लक्षणों के आधार पर, उन्हें दुर्बल, दीन, हीन और कंगाल होना चाहिए। लेकिन वे हैं स्वस्थ, सम्पन्न और सम्राट। यानी जो-जो लक्षण उस ज्योतिषी ने देखे उनके विपरीत ही उनका व्यक्ितत्व दिखाई दिया। ज्योतिषी की बौखलाहट भांप कर, राजा विक्रमादित्य बोले, ‘महाराज, आप चिंतित मत हों। बाहरी लक्षणों से अगर आप संतुष्ट नहीं तो जरा ठहरिए..’ कहते-कहते विक्रमादित्य ने म्यान से तलवार निकाली और अपनी छाती पर चमचमाती तलवार की नोक टिका दी। फिर बोले, ‘छाती चीर कर दिखाता हूं, भीतर के लक्षण भी देख लीजिए।’ ज्योतिषी झट से बोल पड़ा, ‘नहीं, नहीं। मैं समझ गया। आप निर्भय हैं, पुरुषार्थी, एकाग्र हैं। इसलिए तमाम परिस्थितियां आपके अनुरूप हो गई हैं।’ सच है कि युग इंसान को नहीं बनाता, बल्कि इंसान युग को बनाता है। एकाग्रता में हाथ की लकीरें बदलने का दमखम है, जो सच्चा सम्राट तक बना सकती है।ड्ढr ं

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