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यूं ही सामने आएं नई प्रतिभाएं

भारत के युवाआें से सजी क्रिकेट टीम ने आस्ट्रेलिया को अंतत: उसके मांद में शिकस्त दे दी। यह आस्ट्रेलियाई बादशाहत को खत्म करने की आेर भारत का एक और कदम है। जब भारतीय टीम फाइनल में लडख़ड़ाते हुए पहुंची तो लगा कि भारत को फाइनल में मौके नहीं मिलने वाले। मगर हुआ उल्टा। विपक्षी ‘फाइनल’ को तीन मैचों तक भी खींच नहीं पाया। यह युवाआें की अछूती प्रतिभा थी, जिसने ‘धोनी’ को गर्व से भारत लौटने का मौका दिया। नए खिलाड़ियों ने खेल के हर विभाग को नया रूप दिया। इंशात-प्रवीण की बालिंग हो या उथप्पा-गंभीर-रोहित की बैटिंग हो, प्रवीण कुमार तो फाइनल के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी भी रहे। पुरस्कार लेते समय उनका शर्माना भारतीय प्रतिभाआें के कोरेपन को दिखाता है। आज भी कई प्रतिभाएं दूर कहीं गली-मुहल्लों में भटक रही होंगी और आगे चलकर जिनकी धार कुंद हो जाएगी। जरूरत उन्हें सामने लाने की है।ड्ढr आलोक रज्जन झा, यमुना विहार, दिल्ली लड़की को खिलौना न बनाएं लेख ‘कितना समझदार 18 का दूल्हा’ पढ़ा। विधि आयोग ने महिला सशक्तीकरण, बाल विवाह, परिवार जैसे मुद्दों पर देशव्यापी बहस, सुझावों और विचारों के मंथन के बाद एक निर्णयात्मक सुझाव दिया तो लेखिका को इस पर आश्चर्य हो रहा है, यह खुद आश्चर्य की बात है। लड़की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और भावनात्मक रूप से लड़कों से पांच वर्ष आगे होती हैं तो उसे यह सुविधा लिखने-पढ़ने, आर्थिक गतिविधियों का संचालन करने, बैंक खाता खोलने, रोजगार पाने, वोट देने में क्यों न मिले? हमारे समाज की सबसे बड़ी विसंगति अब तक यही रही है कि हम एक नया परिवर बनाते समय ‘सीनियर’ दूल्हा और ‘जूनियर’ दूल्हा रखते हैं। यह बात जीवनपर्यन्त औरत को मर्द के बराबर नहीं आने देती। तरुणी को ‘दूल्हा चाहिए, बालक’ नहीं कह कर लेखिका सदियों पुरानी उस दकियानूसी मान्यता को पोस रही है, जिसमें लड़के का पिता शादी करते समय ऐसा भाव दिखाता है जैसे वह बेटे को खिलौना दिलाने ले जा रहा है। क्या विवाह के सारे सुख लड़के के लिए हैं, लड़की उन्हें नहीं पाना चाहती?ड्ढr युधिष्ठर लाल कक्कड़, लक्ष्मी गार्डन, गुड़गांव यह कैसा सूचना का अधिकार? भारत सरकार ने ‘सूचना का कानून 2005’ इसलिए लागू किया था, ताकि आम जन को समयोचित न्याय, आत्म-सम्मान और शक्ित प्रदान हो सके। नौकरशाही को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने के लिए, भारत सरकार की यह पहल बहुत ही शानदार एवं सराहनीय है। मगर भ्रष्टाचारी नौकरशाह आज भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे। मेरे पति पिछले 18 वर्ष से पूर्णत: नेत्रहीन हैं और मैं नि:संतान भी हूं। इसी मजबूरी में मैंने भारत संचार निगम लि. में, सक्षम अधिकारी द्वारा नियुक्ित पर जून 1से मई 2001 तक निरंतर नौकरी की है। बिना किसी नोटिस के मुझे 24 मई, 2001 को निकाल दिया। मैंने लेबर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अपने कार्य के सबूत भी पेश किए। कोर्ट ने कई समन जारी किए, मगर भारत संचार निगम प्रशासन फरीदाबाद द्वारा कोई भी रिकार्ड पेश नहीं किया गया। तदोपरांत थक-हार कर मैंने सूचना के अधिकार कानून का सहारा लिया। प्रशासन ने मुझे 5 प्रतिशत ही रिकॉर्ड उपलब्ध करवाया। बाकी रिकार्ड के लिए अभी संषर्घशील हूं। डेढ़ वर्ष बीत चुका है। केन्द्रीय सूचना आयोग नई दिल्ली द्वारा आदेश संख्या 1755 आईसी (ए) 2007 दिनांक 27 दिसंबर 2007 के बावजूद भी महाप्रबंधक दूरसंचार फरीदाबाद, अभी तक भी टस से मस नहीं हुए हैं।ड्ढr सुधा रानी, शिव कॉलोनी,फरीदाबाद विषवमन की राजनीति गांधी बाबा के तीन बंदर बड़े जरूर हो गए हैं, लेकिन आज भी अपने उसूलों पे कायम हैं। बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो, बुरा मत कहो के अपने पैगाम में उन्होंने एक टेक और जोड़ दी है बुरा जरूर करो।ड्ढr वीरेन्द्र शर्मा, जोधपुर हॉस्टल, पंडारा रोड, नई दिल्ली

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