DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

तपस्वी का जीवन

योग साधना के दो मार्ग बताए गए हैं। एक है तपस्या का और दूसरा है समर्पण का। पहला बहुत कठिन है, लेकिन दूसरा अत्यंत ही सरल है। इतना सरल कि जिसकी कल्पना हम अमूमन नहीं कर सकते हैं। दोनों रास्तों से जिन्दगी को दिव्य बनाया जा सकता है, लेकिन गौर करें तो दोनों रास्ते कठिन हैं। तप यानी साधना करना कोई मामूली बात नहीं है, लेकिन समाज में रहकर बहुत ही सरल और पवित्र बने रहना उससे भी कठिन है। इसलिए शास्त्र में गृहस्थ जीवन को तपस्वी का जीवन कहा है। और गृहस्थी में रह कर जो भगवत चिन्तन में पूरी पवित्र भावना से लग जाए, वह तो तपों में सबसे बड़ा तप और पवित्रता में सबसे बड़ी पवित्रता है। गृहस्थ-धर्म का पालन करते हुए जो धर्म और योग के रास्ते पर आगे बढ़ता रहता है, शास्त्र में उसे ‘मनस्वी’ कहा गया है। धर्म का पालन करते हुए पूर संकल्प और शक्ित से पुरुषार्थ करते जाएं। भारतीय संस्कृति की एक बहुत बड़ी खासियत है, वह है, पराधीनता में भी धर्म और पुरुषार्थ करने की प्रवृत्ति उसी तरह बनी रहती है, जसे स्वाधीन रहने पर। यही कठिनता को सरलता में बदल देना है। यही साधना है। इस रास्ते पर ही चलकर हमार वैदिक ऋषि-महर्षियों ने पूर ब्रह्माण्ड को अपना बनाया। ज्ञान, कर्म और भक्ित मार्ग का संतुलन केवल वैदिक धर्म और दर्शन में किया गया है। इन तीनों में जो संतुलन बैठा लेता है, वह ही सच्चा साधक माना जाता है। ऐसे लोगों की जिन्दगी ही दिव्यतम बनती है। निहित स्वार्थ के कारण कभी बड़े परमार्थ को नहीं त्यागना चाहिए। यही साधना..यही तपस्या है। भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि तुम अपनी जिन्दगी का हर क्षण हमें समर्पण कर दो और बेफिक्र हो जाओ। मतलब दिव्य बनने के लिए दिव्यतम को अपना सब कुछ बिना किसी संशय के सौंप दो। परमशक्ित को अपनी जिन्दगी का लम्हा-लम्हा सौंप देना कोई मामूली बात नहीं है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: तपस्वी का जीवन