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नेतृत्व के दस साल

याद कीजिए 2004 के आम चुनाव के बाद का वह माहौल, जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री का पद ठुकरा कर मनमोहन सिंह को इस पद पर बिठाया था। उस समय के राजनैतिक चुटकलों में मनमोहन सिंह को हंसी का पात्र बना दिया गया था, इन चुटकुलों में उन्हें एक विनम्र स्वामिभक्त अनुचर की तरह पेश किया जाता था। सोच यह थी कि उन्हें यह पद कृपा से मिला है, इसलिए इसकी पूरी कीमत वसूली जाएगी। आज वे सारे चुटकले इतिहास के कूड़ेदान में पहुंच चुके हैं। पिछले पूरे चार साल में कई उतार-चढ़ाव आए, पर सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह से वैसा ही बर्ताव किया जैसा एक राजा दूसरे राजा से करता है। सोनिया गांधी के दस साल की राजनीति की सबसे उल्लेखनीय बात यही है कि उन्होंने कहीं भी अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। उन्होंने इंदिरा गांधी की तरह मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों वगैरह को बदलने की साप्ताहिक कवायद नहीं की। राजीव गांधी की तरह अपने चंद दोस्तों को ही पूरी रामलीला की बागडोर भी नहीं सौंपी। और नरसिंह राव की तरह वह हाथ पर हाथ धर कर खामोश बैठी भी नहीं। यह ठीक है कि सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस न तो कभी उपलब्धियों के आसमान पर पहुंची, और न ही कभी भ्रष्टाचार के चंगुल से पूरी तरह मुक्त हो पाई, पर वह महज सत्ता की धूर्त दुरभिसंधियों का अड्डा मात्र भी नहीं रह गई। इस सबसे बढ़कर सोनिया गांधी की शैली ने विदेशी नागरिकता और भारतीय संस्कृति की जानकारी न होने जैसी बातों को राजनीति के लिए बेमतलब बना दिया।ड्ढr यह भी सच है कि सोनिया के पास न तो इंदिरा गांधी जैसा करिश्माती व्यक्ितत्व है और न खुद को जनता की भावनाआें से जोड़ लेने की क्षमता, जो हर बार चुनाव आते-आते वोटों को लामबंद करने के नए व कारगर नारे गढ़ लेती थी। उनमें राजीव गांधी के शुरुआती दिनों जैसा सम्मोहन भी नहीं है, और न ही लोगों को सपने देने की कंप्यूटर और इक्कीसवीं सदी जैसी कोई जादू की छड़ी। कांग्रेस भी अब वह कांग्रेस नहीं है, जो इंदिरा गांधी या राजीव गांधी के समय थी। अल्पसंख्यक अभी भी पूरी तरह उसके साथ नहीं हैं और दलित तो काफी पहले ही पार्टी को नमस्कार कह चुके हैं। पिछले कुछ साल में कांग्रेस ने जो जमीन खोई थी, उसे फिर से हासिल करने का कोई कार्यक्रम पार्टी के पास फिलहाल दिखाई नहीं देता। आलोचना यह भी है कि कांग्रेस अब धीरे-धीरे मैनेजमेंट वाली एक संस्था बनती जा रही है, जिसने राजनीति करने की क्षमता खो दी है। पार्टी अध्यक्षता की तारीफ हासिल करने वाली किताबी शैली इन खुरदरी और ठेठ जमीनी चुनौतियों से किस हद तक निपट पाएगी यह देखा जाना अभी शेष है। काफी हद तक इसका जवाब अगले आम चुनाव ही देंगे। राजनीति में चुनाव के नतीजे ही किसी की कामयाबी को नापने का सबसे अच्छा पैमाना होते हैं।

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