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कोई भी कहीं भी बस सकता है : सुप्रीम कोर्ट

महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के खिलाफ महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और शिव सेना के विष वमन अभियान के बीच सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा है कि देश में प्रत्येक भारतीय को कहीं भी बसने और काम तथा व्यापार करने का अधिकार है। समुदाय की भावनायें आहत होने के नाम पर विरोध की प्रवृत्ति को खतरनाक बताते हुये न्यायालय ने कहा है कि इस प्रवृत्ति इससे सख्ती से निबटना चाहिए। न्यायमूर्ति एस. के. सेमा और न्यायमर्ति मार्कण्डेय काटजू की दो सदस्यीय खण्डपीठ ने जैन समुदाय के पर्व के दौरान अहमदाबाद में नौ दिन बूचडख़ाने बंद करने से जुड़े विवाद पर सुनाये गये फैसले में शुक्रवार को यह टिप्पणी की। न्यायालय ने गुजरात हाई कोर्ट के 22 जून, 2005 के फैसले के खिलाफ हिंसा विरोधक संघ की अपील का निबटारा करते हुये एक सीमित अवधि के लिये बूचडख़ानों पर पाबंदी को सही ठहराया है। न्यायाधीशों ने कहा कि भारत राज्यों का महासंघ नहीं बल्कि राज्यों का संघ है जिसमें सिर्फ भारतीयता ही एकमात्र नागरिकता है। ऐसी स्थिति में प्रत्येक भारतीय को देश में कहीं भी जाने, बसने और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी इच्छा का काम का अधिकार प्राप्त है।

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