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एससी-एसटी के आरक्षण को हाइकोर्ट में चुनौती

अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को आरक्षण दिये जाने को हाइकोर्ट में चुनौती दी गयी है। शुक्रवार को आंशिक सुनवाई के बाद अदालत ने सभी पक्ष को सोमवार को अपना लिखित पक्ष रखने का निर्देश दिया है। केके शर्मा एवं अन्य तीन लोगों ने याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 334 में सिर्फ दस वर्ष के लिए एससी, एसटी को आरक्षण देने की व्यवस्था की गयी थी। लेकिन संसद ने समय-समय पर इसमें संशोधन कर इसे हर बार दस वर्ष के लिए बढ़ा दिया है। परिणाम स्वरूप आजादी के 60 साल बाद भी इन लोगों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है, जो गलत है। संसद को इस अनुच्छेद में संशोधन करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि संविधान निर्माण के लिए बनी कमेटी ने 10 वर्ष के लिए ही इस प्रावधान को लागू किया था। इस कारण इस अनुच्छेद में अब तक किये गये सभी संशोधन गैरकानूनी हैं।ड्ढr सरकार का पक्ष रखते हुए महाधिवक्ता एसबी गाड़ोदिया ने अदालत को बताया कि संविधान में किया गया संशोधन संविधान के अनुरूप है और इसमें कोई त्रुटि नहीं है। उन्होंने अदालत को बताया कि पूर्व में राजस्थान और उड़ीसा हाइकोर्ट में भी यही सवाल उठाया गया था। उड़ीसा हाइकोर्ट ने यह निर्णय दिया है कि संसद को संविधान में संशोधन करने का पूरा अधिकार है। महाधिवक्ता ने बताया कि सभी बातों पर गौर करने के बाद देश और जनहित में हर 10 वर्ष बाद यह संशोधन किया जा रहा है। वर्तमान में एससी- एसटी को आरक्षण की आवश्यकता है ताकि वह मुख्य धारा से जुड़ सके और देश के विकास में हिस्सेदार बन सके। दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने सोमवार तक के लिए सुनवाई स्थगित कर दी और लिखित पक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। प्रार्थी की ओर से वरीय अधिवक्ता राजीव शर्मा ने बहस की।

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