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आधुनिक जीवन और पाप-पुण्य का दर्शन

पन्द्रह सौ वर्ष पहले कैथोलिक धर्म के अनुयायियों के लिए उनके धर्मगुरु पोप ग्रेगरी महान् ने सात महापातकों ‘सेवन डेडली सिंस’ की एक तालिका बनाई और अपने हर अनुयायी को उनसे बचने की कड़ी ताकीद की थी। यह तालिका वक्त बदलने के साथ अधिकतर ईसाइयों के लिए इतिहास का भूला-बिसरा खण्ड बन गई। पर हाल में वर्तमान् पोप की आेर से वैटिकन के मुखपत्र में वर्जित कमरे की उस पन्द्रह सौ बरस पुरानी तालिका को सामयिक संदभरे से जोड़कर पाप-पुण्य की व्याख्या करने वाला एक महत्वपूर्ण बयान छपा है। इसमें आज के ग्लोबल विश्व पर गहरा दुष्प्रभाव डालने वाले नए कुकमरे के संदर्भ में पोप ने पुराने सात महापातकों की श्रेणी में कुछ नए किस्म के काम भी निषिद्ध और धर्मविरोधी करार दिए हैं, जैसे मादक द्रव्यों का व्यापार, प्लास्टिक द्वारा पर्यावरण प्रदूषण फैलना और जेनेटिक इंजीनियरिंग द्वारा शिशु जन्म के कुदरती नियमों से छेड़छाड़ करना। इन कामों से जुड़े हुए तस्करों, व्यापारियों और वैज्ञानिकों को कहा गया है, कि वे तुरत इन मानवजीवन विरोधी कामों से हटें, और अपने कुकमरे पर सच्चा पश्चाताप करें। ताकत तथा पैसे की अंधी हवस के मारे लोगों, खासकर नए धनकुबेरों के भीतर घटते जा रहे पाप बोध पर भी पोप ने गहरी चिन्ता और शोक जताया और उनको याद दिलाया, कि उनके द्वारा सिर्फ हवस के चलते अथाह दौलत बटोरते जाने से भी दुनिया में निपट गरीबों की तादाद बढ़ गई है। और इसके दुनिया ही नहीं उनके लिए भी सिर्फ भौतिक ही नहीं, आध्यात्मिक दुष्परिणाम होंगे। आश्चर्य यह नहीं, कि एक पोप ने सदियों बाद धर्माचायरे द्वारा दी गई पाप-पुण्य की पारंपरिक तालिका की एक बार फिर आधुनिक जीवन के संदभरे में पुनव्र्याख्या की, और पश्चिमी दुनिया को उसके नैतिक कर्तव्याकर्तव्यों की याद दिलाई। आश्चर्य यह, कि हमारे यहाँ बैठे हुए अनेक धमरे के तमाम बातून गुरुआें ने लोकतांत्रिक भारत के राज-समाज के लिए हमारे पारंपरिक आध्यात्मिक अनुशासनों और पाप-पुण्य की अवधारणा की नई और सामयिक व्याख्या की जरूरत महसूस नहीं की। इसकी जरूरत इसलिए भी है कि लोकतंत्र में एक धर्मनिरपेक्ष राज्य और राजनीति को नैतिक दिशाबोध देने वाली ऐसी कोई सेकुलर नैतिकता हमारे यहाँ आजादी के साठ बरसों बाद भी नहीं दिखती है। हमारे देश में लोग धार्मिक परंपराआें से बंधकर साल में एकाधिक बार नवरात्रि, रमजान या लैण्ट के दौरान लंबे-लंबे धार्मिक उपवास तो बिना किसी दबाव के सहर्ष रखते हैं, पर सार्वजनिक सड़कों पर उतरते ही वे देश के लोकतांत्रिक कानूनों की धज्जियाँ कर देते हैं। कृतकृत्य भाव से कड़कती ठण्ड में भी हर साल जो लाखों लोग नदी-सरोवरों में पर्व की डुबकी लगाने को संगम जा पहुँचते हैं, और तमाम कष्ट सह कर जोखिमभरी लंबी-लंबी तीर्थयात्राआें पर मानसरोवर से मक्कामदीना तक दौड़े चले जाते हैं, उनके द्वारा आज भी समय पर दफ्तरों में पहुँचना और ईमानदारी तथा निष्ठा के साथ सरकारी काम का निष्पादन सुनिश्चित नहीं किया जा सका है। ऐसा भी नहीं, कि अपने-अपने धार्मिक कानूनों-परंपराआें की तहत हिन्दू-मुसलमान, बोहरा, सिख, ईसाई समेत हर सम्प्रदाय ने वर्ग या जाति विशेष के खिलाफ अन्याय और गहरी शारीरिक यातनाआें को स्वीकार नहीं किया फिर भी संसद या राष्ट्रीय हवाई अड्डों और बैंकों को चुस्ती से चलाने के लिए अगर इन्हीं नागरिकों पर देश का कानून कष्टकर कटौतियाँ तथा अनुशासन लागू करे तो पलक झपकते लोग हिंसक धरनों-प्रदर्शनों पर उतारू हो जाते हैं। देश की प्रतिनिधि संसद में तो संयत लोकतांत्रिक व्यवहार की ऐसी धज्जी उड़ाई जाने लगी है कि लोकसभाध्यक्ष बेचारगी से कह उठे कि सांसद रूल-बुक को एक बारगी से जला ही डालें तो ठीक! जब लोकतंत्र द्वारा दी गई तर्कसंगत विरोध की मर्यादाएँ यूं मिटा दी जाएँ, तो कभी न कभी राजकीय दमन की मर्यादाआें का टूटना भी स्वाभाविक बन जाता है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक सशस्त्र बलों और जनता के उग्र जत्थों के बीच अनेक ताजा भिड़ंतें हर जगह बढ़ती अराजकता की सूचना दे रही हैं। यहाँ पर कुछेक लोग कह रहे हैं कि यह चुनावी मौसम है, ऐसे में आंदोलनों, धरनों का तनिक ज्यादा नाटकीय और हिंसक मोड़ ले लेना दु:खद भले हो, पर सहज-स्वाभाविक भी है, सो धीरज धर कर बैठा जाए। यह स्थायी दौर नहीं। पर सच तो यह है, कि अगर विरोधी दलों को अपने पक्ष की सचाई में और जनता की उस सचाई के प्रति सहानुभूति में इतना ही भरोसा होता, तो चुनाव के पहले तो ऐसी आक्रामकता घट जानी चाहिए थी, क्योंकि चन्द महीनों में बैलट बॉक्स की मार्फत जनता दूध का दूध और पानी का पानी कर ही देती। लेकिन विरोधियों को भी चुनाव में मतदान अपने पक्ष में जाने की बात पर खुद भरोसा नहीं है। इसलिए वे कभी ‘जोधा अकबर’ के बहाने और कभी ‘राम-सेतु’ अथवा गैरमराठियों के बहाने किस्तों में गुण्डागर्दी और हिंसा करवा रहे हैं। और हाथ से स्थिति निकल जाने पर एक (सर्वदलीय रूप से स्वीकार) बहाना यह दिया जा रहा है, कि अनजाने में जुलूस में कुछ शरारती असामाजिक तत्व आ पैठे थे, जिन्होंने सारी तोड़फोड़ की। पर क्या यह इन जुलूसों के प्रणेताआें की नालायकी का सबूत नहीं, कि जहाँ व्यवस्था में वे एक ईश्वरीय चुस्ती और सहिष्णुता की माँग करते हैं, वहीं खुद अपने समर्थकों के बीच घुस आए असामाजिक तत्वों और उनकी हिंसा को वे देख या रोक नहीं पाते? अगर सैकड़ों की भीड़ सिर्फ आधे दर्जन गुण्डों की भीषण गुण्डई को तटस्थ और निष्क्रिय होकर देखती है, तो यह क्यों न माना जाए कि गुण्डे उस तमाशबीन कायर भीड़ की कुछ गुप्त इच्छाआें की भी पूर्ति कर ही रहे होंगे? क्या हिंसा करना और हिंसक दृश्यों को बिना पलक झपकाए देखने की लालसा इनमें से एक पाप है, और दूसरा सामान्य मानवीय कुतूहल? काश! हमारे मान्य और चिरंतन रूप से उदास गृहमंत्री तथा लोकसभाध्यक्ष ऐसे उजड्ड हिंसक आन्दोलन करने कराने वालों को चेतावनी देते, कि वे मौजूद हों न हों, संसद से सड़क तक हरेक राजनीतिक दल की उजड्डता की जिम्मेदारी दल के अध्यक्ष की और जुलूसों की उजड्डता की जिम्मेदारी जुलूस निकलवाने वालों की ही मानी जाएगी। तब सरकार और सदन के प्रमुख बेझिझक होकर कठोरतम कदम उठाएंगे, और यह तर्क कतई नहीं दिया जाएगा, कि गलती से पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया था, या मार्शलों ने ठीक इशारा नहीं समझा। जिन सुधी पाठकों (जिनमें राजनेता और मान्य जनप्रतिनिधि भी हो सकते हैं) को पाप-पुण्य की यह व्याख्या तथा स्पष्ट और त्वरित दमन के यह सुझाव बहुत कठोर और पुरातनपंथी प्रतीत हो रहे हों, कृपा कर सोचें, कि एक सेकुलर राज्य के दायरे में जंगल-राज से बचने और स्पष्ट विधि-निषेधों द्वारा सभी नागरिकों को नियमित और संचालित करने के लिए नाजुक मर्यादाएँ, विधि निषेध और एक समग्र नैतिकता अगर ऐसे नहीं बनीं, तो फिर कैसे बनेंगी? जैसा कि पोप ने भी कहा, लोकतंत्र के ग्लोबल युग में पूँजीवाद की नैतिकता को धर्म की पुरानी नैतिक व्याख्याआें से पूरी तरह समझा या व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। इसलिए हमारे लिए भी आज यह पड़ताल करना जरूरी है, कि क्या अपनी उन बहुरंगी परंपराआें की नैतिकता की आज के संदभरे में पुनव्र्याख्या करके हम भविष्य के लोकतंत्र में कुकमरे पर बाँध बाँधने की कुछ समन्वयमूलक और कारगर तरकीबें गढ़ सकते हैं?ंं

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