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हॉकी में पूरी तरह फेल साबित हुए गिल साहब

हॉकी के 80 साल के इतिहास में पहली बार भारत ओलंपिक के लिए क्वालिफाई नहीं कर पाया? हमारी हॉकी किस दिशा में जा रही है? लगता है हमारी कलात्मक हॉकी कहीं खो गई है। अब हमारे पास फॉरवर्ड नहीं हैं, जो पेनल्टी कॉर्नर बना सकें। पेनल्टी कॉर्नर को गोल में बदलने वाले खिलाड़ी भी अब टीम में नार नहीं आते। जूनियर और सब-जूनियर टीमों से हमें और योग्य खिलाड़ी तलाशने होंगे। नेशनल्स पर संजीदगी से ध्यान देना होगा। क्वालिफाइंग में इंग्लैंड से हारने के बाद चारों ओर से फेडरेशन और केपीएस गिल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया गया है। यह किस हद तक उचित है? कहीं न कहीं फेडरेशन भी इसके लिए जिम्मेदार है। गिल साहब को पूर्व खिलाड़ियों की आलोचना करने के बजाय खुद इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। बेशक उन्होंने अन्य फील्ड में नाम कमाया हो, लेकिन हॉकी में वे पूरी तरह से फेल साबित हुए हैं। हां, इतना जरूर कहूंगा कि अब बयानबाजी बंद करके हॉकी के बारे में सोचना चाहिए। कैसे हॉकी को फिर से पटरी पर लाया जाए, इस बारे में विचार-विमर्श करना चाहिए। हॉकी की प्रतिष्ठा को कैसे फिर से वापस पाया जा सकता है? इसके लिए हमें क्या कुछ करना चाहिए? सबसे ज्यादा जरूरत है इंफ्रास्ट्रक्चर की। हमारे पास टर्फ नहीं हैं। मैं तो यही कहूंगा कि सब-जूनियर और जूनियर वर्ग की हॉकी भी पूरी तरह से टर्फ पर खेली जानी चाहिए। 2012 ओलंपिक के लिए हमें अभी से तैयारियां करनी होंगी। मुझे समझ नहीं आ रहा कि रिक चार्ल्सवर्थ जैसे कोच की सेवाएं लेने से आईएचएफ क्यों कतरा रहा है। क्वालिफाइंग में हार के क्या कारण रहे? क्या ठीक से प्लानिंग नहीं हुई थी? गिल साहब बोल रहे हैं कि हमें तो पहले से ही पता था कि ऐसा ही होगा। जब एक हॉकी का सर्वेसर्वा ऐसा बोलेगा तो टीम का प्रदर्शन कैसा होगा खुद ही अंदाजा लगाया जा सकता है। मुझे लगता है कि क्वालिफाइंग के लिए ठीक से प्लानिंग ही नहीं हुई थी। हम सिर्फ एशिया-एशिया का गाना गाते रहे। होना यह चाहिए था कि हमें ओलंपिक क्वालिफाइंग से पहले कुछ अच्छी यूरोपीय टीमों के साथ मैच खेलने चाहिए थे। क्लबों के साथ खेलने से ओलंपिक क्वालिफाइंग जैसे महत्वपूर्ण टूर्नामेंट नहीं जीते जाते। वैसे भी क्वालिफाइंग हमारे लिए ओलंपिक से भी बड़ा था।

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